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इंदौर। कभी पूरी देश में प्रतिष्ठित माना जाने वाला मध्यप्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के चेहरे पर कुछ सालों से बदनामी की कालिख पुत रही थी। इसका प्रमुख कारण एमपीसीए के अध्यक्ष अभिलाष खांडेकर की मनमानी थी। टिकटों की कालाबाजारी से लेकर टैक्स चोरी और पिच खराबी का आरोप भी एमपीसीए ने सहा। अब सिंधिया परिवार की तीसरी पीढ़ी महाआर्यमन सिंधिया के अध्यक्ष चुने जाने से मध्यप्रदेश के क्रिकेट जगत की उम्मीदें बढ़ गई हैं।
उल्लेखनीय है कि पहली बार एमपीसीए के अध्यक्ष पद पर एक 29 साल के युवा की ताजपोशी हुई है। वे सिंधिया परिवार की तीसरी पीढ़ी के रुप में इस पद की कमान संभालेंगे। पिछले तीन सालों में महानआर्यमन क्रिकेट के लिए सक्रिय हैं। उन्हें 2022 में जीडीसीए के उपाध्यक्ष नियुक्त करने के साथ ही एमपीसीए का आजीवन सदस्य बनाया गया था। उन्होंने मध्यप्रदेश क्रिकेट लीग (एमपीएल) की शुरुआत करते हुए पिछले दो साल में ग्वालियर में एमपीएल का सफल आयोजन किया।
दादा और पिता भी रहे हैं अध्यक्ष
एमपी क्रिकेट एसोसिएशन पर हमेशा से सिंधिया परिवार का दबदबा रहा है। दादा माधवराव सिंधिया 1982 से 2001 तक एमपी क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष रहे हैं। वहीं 2004 से 2019 तक ज्योतिरादित्य सिंधिया एमपीसीए के अध्यक्ष रहे हैं। महारानी उषा रानी के पति सतीश मल्होत्रा लंबे समय तक एमपीसीए के अध्यक्ष पद पर रहे। एमपीसीए सदस्यों के आग्रह पर माधवराव सिंधिया पहली बार एमपीसीए के अध्यक्ष बने। इसके साथ ही वे भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड सदस्य भी रहे। 1990 में वे बीसीसीआई के अध्यक्ष बने और 1993 तक इस पद पर बने रहे। 2002 में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने पहली बार लोकसभा का उपचुनाव लड़ा था। 2004 में ज्योतिरादित्य सिंधिया एमपीसीए के अध्यक्ष बनाए गए।
पटखनी खा चुके हैं मंत्री विजयवर्गीय
उल्लेखनीय है कि 2012 में एमपीसीए के चुनाव में ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनकी पैनल ने एकतरफा जीत हासिल की थी। तब कैलाश विजयवर्गी ने उन्हें चुनौती दी थी। पूरी ताकत झोंकने के बाद भी कैलाश विजयवर्गीय पैनल का एक भी उम्मीदवार जीत नहीं सका था। सिंधिया ने विजयवर्गीय को 77 वोटों से हराया था। सिंधिया को 150, जबकि विजयवर्गीय को 73 मत ही मिले थी इसके बाद विजयवर्गीय ने फिर कोशिश नहीं की। बाद में सिंधिया कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए। इसके बाद तो विजयवर्गीय का पत्ता पूरी तरह से कट गया।
सिंधिया परिवार पर लोगों को भरोसा
क्रिकेट के मामले में मध्यप्रदेश के लोगों ने हमेशा सिंधिया परिवार पर भरोसा जताया है। सिंधिया जब कांग्रेस में थे, तब भी लोग उनके साथ थे, अब जबकि वे भाजपा में आ गए हैं, लोगों का भरोसा अब भी कायम है। यही वजह है कि महाआर्यमन को भी एमपीसीए के सभी सदस्यों का पूरा समर्थन मिला है।
अभिलाष खांडेकर ने कराई एमपीसी की बदनामी
एमपीसीए की कमान जब से अभिलाष खांडेकर के पास आई, तब से पूरे देश में इस प्रतिष्ठित संगठन की खूब बदनामी हुई। विवादित पिच, टिकटों की कालाबाजारी जैसे आरोपों के बाद इंदौर में मैचों का सिलसिला बंद सा हो गया था। टी-20 वर्ल्ड कप के साथ ही आईपीएल के दो सीजन भी इंदौर में नहीं हुए थे। तमाम तरह के विवादों के कारण बीसीसीआई का इंदौर से मोह भंग हो गया था। अब जाकर इंदौर को कुछ मैच मिले हैं।
टिकटों की कालाबाजारी के आरोप
जब से खांडेकर ने एममपीसीए की कमान संभाली, तब से टिकटों की कालाबाजारी के आरोप भी लगते रहे। 2022 में भारत और दक्षिण अफ्रीका के मैच में भी एमपीसीए पर यह आरोप लगे थे। उसम समय इंदौर में दस हजार से भी कम टिकट बिके थे, जबकि स्टेडियम की क्षमता 30 हजार दर्शकों की है।
हर मैच में अध्यक्ष खांडेकर की मनमानी
लगभग हर मैच में एमपीसीए अध्यक्ष अभिलाष खांडेकर ने अपन मनमानी की। टैक्स का भुगतान न होने पर नगर निगम ने छापा भी मारा था, तब एमपीसीए के अध्यक्ष अभिलाष खांडेकर काफी आग–बबूला हो गए थे। उन्होंने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर नगर निगम की शिकायत की थी और पास मांगने के आरोप लगाए थे। खांडेकर के कार्यकाल में पिच की भी बदनामी हुई थी। बार्डर गावस्कर ट्राफी में इंदौर और आस्ट्रेलिया क्रिकेट टीम के बीच टेस्ट हुआ, जो तीन दिन में ही यह खत्म हो गया। इस दौरान मैच रेफरी क्रिस ब्राड ने मैच जल्दी खत्म होने कारण पिच का खराब होना बताया था।



