इंदौर। कलेक्टर साहब, आपने एक बड़े प्राइवेट स्कूल पर पानी, गंदगी और खाने की गुणवत्ता आदि को लेकर कार्रवाई कर दी। ये बड़े स्कूल हैं, इनके पास पैसे हैं ये तुरंत अपनी व्यवस्था संभाल लेंगे। जरा, उनके बारे में भी सोचिए जो सिर्फ आपके भरोसे ही बैठे हैं।
आपके बारे में कहा जाता है कि आप बहुत सख्त हैं और शिकायत मिलने पर तुरंत एक्शन लेते हैं। शिशुकुंज स्कूल के मामले में आपने ऐसा ही किया। यह बहुत अच्छी बात है, लेकिन पिछले कई दिनों से मीडिया में आंगनबाड़ियों के बारे में जो खबरें आ रही हैं, उस पर शायद आपकी नजर नहीं जा पा रही है। जरा, एक बार इस पर भी तो संज्ञान लीजिए।
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एलपीजी तक नहीं, लकड़ी पर बन रहा खाना
आपके जिले के अधिकांश आंगनबाड़ियों में एलपीजी तक नहीं है। ईंटे जोड़कर लकड़ी पर खाना बन रहा है। आप तो प्रशासन के मुखिया हो, आपके रहते आंगनबाड़ियों को एलपीजी सिलेंडर क्यों नहीं मिल पा रहा। क्या विभाग वाले आपकी नहीं सुन रहे या आप तक यह बातें पहुंच ही नहीं पा रहीं।

खाने के ऊपर मंडरा रही हैं मक्खियां
प्रदेश सरकार बच्चों को पोषक खाना देने के लिए हर महीने मोटी रकम खर्च करती है, फिर भी उन्हें मिल क्या रहा है? मीडिया में जो फोटो और वीडियो सामने आ रहे हैं, उसमें आटे की पूड़ियों के ऊपर मक्खियां मंडराती दिख रही हैं। दाल बेचारा पानी से संघर्ष करता रहता है, सब्जी में सब्जी तलाशते रहते हैं बच्चे।
अधिकांश आंगनबाड़ियां बेहाल
बताया जाता है कि जिले में 1839 आंगनवाड़ियां हैं। इनमें 3 से 6 वर्ष के 86 हजार 157 बच्चों को रोज नाश्ता और ताजा भोजन उपलब्ध कराया जाता है। 705 स्वयं सहायता समूह इसकी जिम्मेदारी उठाते हैं। हर समूह औसतन 12 आंगनवाड़ियों में भोजन पहुंचाता है। सरकार इस व्यवस्था पर हर साल करीब 20 करोड़ रुपए खर्च करती है।
जहां खाना बन रहा, वहां की सफाई देख आते
बच्चों के लिए जहां कथित पौष्टिक खाना तैयार हो रहा है, वहां की सफाई व्यवस्था एक बार आप देख आते। माना कि आपके पास समय नहीं है, अपने किसी मातहत को ही भेज देते। आखिर यह खाना भी प्राइवेट स्कूलों के किचन की तरह ही बच्चों के पेट में पहुंचता है।
कहीं भी मेन्यू का नहीं होता पालन
बताया जाता है कि इन आंगनबाड़ियों में मेन्यू का पालन भी नहीं होता। एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार बिहाड़िया पहाड़घाटी में तय मेन्यू में पुलाव था, लेकिन बच्चों को साधारण चावल के साथ कढ़ी परोसी गई थी। इसी तरह उमठ में दो दिन से बच्चों को खाना ही नहीं मिला था।
और कुपोषित हो रहे बच्चे
सरकारी आंकड़ों के अनुसार ही हर महीने जिले के 80 से 100 बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्र भेजना पड़ रहा है। आंगनवाड़ियों में स्व सहायता समूह जो आहार दे रहे हैं, उसमें 15 से 20 ग्राम प्रोटीन और 500 कैलोरी जरूरी है। ज्यादातर जगह गंदगी के बीच भोजन बन रहा है। विभाग के पोषण ट्रैकर एप में मौजूद डेटा के अनुसार, जिले में 0 से 5 वर्ष के 44 हजार बच्चे नाटेपन व 25 हजार कम वजन के हैं।
इधर, शिशुकुंज को 14 दिन का अल्टीमेटम
इंदौर के शिशुकुंज स्कूल में भोजन करने के बाद बच्चों के बीमार होने की घटना के बाद जिला प्रशासन ने सख्त रुख अपनाया है। इसी क्रम में बायपास रोड स्थित झलारिया की शिशुकुंज एजुकेशनल सोसायटी का निरीक्षण किया गया। जांच के दौरान खाद्य सुरक्षा और स्वच्छता मानकों में कई गंभीर खामियां मिलीं। इसके चलते संस्थान को खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 की धारा 32 के तहत सुधार सूचना पत्र (इम्प्रूवमेंट नोटिस) जारी किया है। प्रशासन ने संस्थान को 14 दिनों के भीतर सभी कमियों को दूर कर आवश्यक दस्तावेजों के साथ अनुपालन प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।



