इंदौर में किसको दिख रहे हैं गड्ढे, अपनी आंखों का इलाज कराओ, गड्ढे होते तो महापौर या भाजपा के किसी नेता को नहीं दिखते?

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इंदौर। अपने शहर के जैसे लोग बावला हो गए हैं। सफाई में लागतार आठ बार पूरे देश में नंबर वन आने वाले इंदौर को बदनाम करने में लगे हुए हैं। जब न तब सड़कों के गड्‌ढे का मामला उछालते रहते हैं। अब विपक्ष के नेता ने प्रदर्शन कर दिया तो इससे क्या हो गया? वह तो विपक्ष का नेता है, उसका काम ही सत्ता पक्ष का विरोध करना। आप तो समझदार हो, महापौर को अपना मित्र मानकर लाखों वोटों से जिता चुके है, फिर आप क्यों चिल्ला रहे हो।

बुरा न मानना, एक बात समझ लेना। इंदौर पूरी तरह से भाजपाई हो चुका है। इस बात से तो इनकार नहीं कर सकते। कोई भी बंदा टिकट ले आएगा तो आप उसे जिता ही दोगे। अब जब युवा अतिरिक्त महाधिवक्ता और अच्छे वक्ता पुष्यमित्र भार्गव को महपौर का टिकट मिला तो आपने क्या किया? खुशी-खुशी भाजपा के नाम पर वोट डाला न। यही महापौर अगली बार विधानसभा का टिकट भी लेकर आएंगे या हो सकता है लोकसभा का और आप सबकुछ भूलकर फिर जाकर कमल का बटन दबा दोगे।

गड्‌ढे की बात करना शहर की तौहीन

पहली बात भाजपा के नजरिए से देखें तो शहर में गड्‌ढे हैं ही नहीं। दूसरा जब महापौर को नहीं दिख रहे तो आपको कैसे दिख रहे हैं? शहर के प्रथम नागरिक की हां में हां मिलाना तो आपका फर्ज बनता है। चलो महापौर को नहीं दिखते गड्‌ढे, भाजपा के किसी और नेता को तो दिखते? भाजपा नगर अध्यक्ष से लेकर सभी विधायकों, पार्षदों और सांसद तक किसने गड्‌ढों की बात की। ऐसे में आपको अगर सड़कों पर गड्‌ढे दिख रहे हैं तो या तो आपकी आंखों खराब हैं या फिर आप सत्ता-संगठन और शहर को नीचा दिखाने पर तुले हो। ऐसे में अच्छा तो यह होगा कि आप अपनी आंखों की जांच करा लो।

आज के दौर में अपने नंबर बढ़ाने से फुर्सत किसे है

एक सच तो यह भी है कि आजकल नेतागिरी भी काफी मुश्किल हो गई है। आप पार्षद बन गए, विधायक बन गए या फिर सांसद या महापौर ही बन गए, सिर्फ बनने से काम नहीं चलने वाला। प्रदेश और देश के नेताओं को दिखाना भी पड़ता है। अगर आगे राजनीति की दुकान चलानी है तो भोपाल और दिल्ली में सक्रिय रहना पड़ेगा। ऐसे में इंदौर की चिन्ता कौन करे। बेचारे, अपने महापौर भी ऐसा ही कर रहे हैं, तो इसमें गलत क्या है?

त्योहार तो हर साल ही आते हैं, इस बार गड्‌ढों में मना लो

लोग कह रहे हैं कि पहले भी भाजपा के महापौर हुआ करते थे। बारिश भी होती थी और सड़कें खराब भी होती थीं, लेकिन गणेश चतुर्थी से लेकर दीपावली तक सड़कें चकाचक हो जाती थीं। ऐसे लोगों को यह समझना होगा कि त्योहार तो हर साल आते हैं। ऐसे में अगर आप गड्‌ढे वाली सड़कों पर ही त्योहार मना लो तो क्या नुकसान। अब देखो न आरएसएस ने 5 अक्टूबर को पथ संचलन निकाला। जहां सड़कों पर गड्‌ढे थे, पानी भरा था, वहां लकड़ी के पटिए बिछा कर संचलन निकला। क्या इसके लिए उन्होंने महापौर को कोसा क्या?

महापौर का यह काम नहीं कि गड्‌ढे देखते फिरें

लोग कह रहे हैं कि सीएम जब इंदौर आते हैं तो महापौर सुबह से शाम तक उनके साथ घूमते रहते हैं। तरह-तरह के आयोजनों में दिनभर बिजी रहते हैं। बचा-खुचा समय चिटि्ठयां लिखने और राष्ट्रीय अवसरों के आयोजनों की तैयारियों में निकल जाते हैं, लेकिन उन्हें गड्‌ढे नहीं दिखते। अब आप ही सोचो जिस के कंधे पर इंदौर जैसे शहर का बार हो, वह बेचारा क्या गड्‌ढा देखता फिरेगा। इसके लिए 85 पार्षद, विधायक, नगर निगम का इतना बड़ा अमला तो है। जब उन्हें गड्‌ढे नहीं दिख रहे तो महापौर को तो इग्नोर ही करना पड़ेगा।

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