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नई दिल्ली। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को एक बड़ा दावा किया है। उन्होंने कहा कि जवाहरलाल नेहरू सार्वजनिक धन यानी सरकारी पैसों सेअयोध्या में बाबरी मस्जिद का निर्माण कराना चाहते थे, लेकिन सरदार वल्लभभाई पटेल ने इस प्रस्ताव को आगे नहीं बढ़ने दिया।
रक्षा मंत्री ने यह बात गुजरात के सडली गांव में आयोजित यूनिटी मार्च कार्यक्रम में कही। उन्होंने कहा कि नेहरू ने सार्वजनिक धन से बाबरी मस्जिद बनाने का सुझाव दिया था, लेकिन पटेल ने साफ मना कर दिया। नेहरू ने पटेल के निधन के बाद उनके स्मारक के लिए जनता द्वारा जुटाए गए धन को कुएं और सड़कों के निर्माण में खर्च करने का सुझाव दिया था, जो उनकी विरासत को दबाने की कोशिश थी। रक्षा मंत्री ने कहा कि पटेल सच्चे अर्थों में उदार और निष्पक्ष नेता थे, जिन्होंने कभी भी तुष्टिकरण की राजनीति नहीं की।
कार्यक्रम में राजनाथ सिंह ने कहा कि सोमनाथ मंदिर को पुनर्निर्माण के लिए सरकार से एक भी पैसा नहीं लिया गया था, क्योंकि पूरा धन जनता से आया था। उन्होंने कहा कि इसी तरह अयोध्या में राम मंदिर भी पूरी तरह जनता के सहयोग से बना है और यह वास्तविक धर्मनिरपेक्षता का उदाहरण है। राजनाथ सिंह ने कहा कि कांग्रेस के 1946 के अध्यक्ष चुनाव में अधिकतर प्रस्ताव पटेल के पक्ष में थे, लेकिन महात्मा गांधी के अनुरोध पर पटेल ने अपना नाम वापस ले लिया और नेहरू अध्यक्ष बने, जिसके बाद वह प्रधानमंत्री बने।
रक्षा मंत्री ने कहा कि कुछ राजनीतिक ताकतों ने वर्षों तक पटेल की विरासत को दबाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्टैच्यू ऑफ यूनिटी बनवाकर पटेल को वह सम्मान दिलाया जो उन्हें पहले मिलना चाहिए था। सिंह ने आरोप लगाया कि नेहरू ने खुद को भारत रत्न दिया, लेकिन पटेल को उस समय यह सम्मान नहीं मिला। उन्होंने कहा कि यह स्पष्ट दिखाता है कि उस समय उनकी विरासत को नजरअंदाज किया गया। राजनाथ सिंह ने कहा कि कश्मीर के विलय पर पटेल की सलाह मान ली जाती तो कश्मीर समस्या लंबे समय तक देश के लिए बोझ नहीं बनती। उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर पटेल ने कड़े कदम उठाए, जैसे हैदराबाद के विलय में किया गया सख्त निर्णय। सिंह ने कहा कि मोदी सरकार ने भी ऑपरेशन सिंदूर में इसी मजबूत रुख का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि भारत किसी को उकसाता नहीं, लेकिन उकसाए जाने पर जवाब देना अच्छी तरह जानता है।



