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रात की रोशनी बन रही नया जलवायु खतरा: कृत्रिम प्रकाश बढ़ा रहा कार्बन उत्सर्जन, घटा रहा पृथ्वी की अवशोषण क्षमता
रातों में बढ़ती कृत्रिम रोशनी अब सिर्फ प्रकाश प्रदूषण नहीं रही, बल्कि वैश्विक कार्बन संतुलन के लिए नया गंभीर खतरा बनकर उभर रही है। एक नए वैश्विक अध्ययन में पाया गया है कि रात की जगमगाहट पौधों, सूक्ष्मजीवों और जानवरों की गतिविधियां बढ़ाकर कार्बन उत्सर्जन में तेज इजाफा कर रही है, जबकि कार्बन को अवशोषित करने की पृथ्वी की क्षमता में कोई सुधार नहीं हो रहा है।

कार्बन चक्र पर बड़ा असर
क्रैनफील्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के अनुसार, कृत्रिम प्रकाश
- पौधों और जीवों को असामान्य रूप से सक्रिय कर देता है,
- जिससे CO₂ उत्सर्जन बढ़ता है,
- लेकिन प्रकाश संश्लेषण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता,
जिससे उत्सर्जन बढ़ता जाता है और अवशोषण स्थिर रहता है।
यानी, कृत्रिम प्रकाश पृथ्वी को ज्यादा कार्बन छोड़ने और कम सोखने की स्थिति में धकेल रहा है।
महाद्वीपों तक बदले कार्बन पैटर्न
अध्ययन में उत्तरी अमेरिका और यूरोप के 86 कार्बन मॉनिटरिंग स्टेशनों और सैटेलाइट डेटा का विश्लेषण किया गया। निष्कर्ष बताते हैं कि कृत्रिम रोशनी के असर इतने व्यापक हैं कि यह महाद्वीप-स्तर पर कार्बन चक्र के पैटर्न को बदल रहा है।
शोध अंतरराष्ट्रीय जर्नल नेचर क्लाइमेट चेंज में प्रकाशित हुआ है।
तेजी से फैलता खतरा
- कृत्रिम रोशनी हर साल 2% की दर से बढ़ रही है—यह दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती पर्यावरणीय समस्याओं में से एक है।
- वैश्विक बिजली खपत का 15% हिस्सा सिर्फ लाइटिंग में खर्च होता है।
- अत्यधिक रोशनी मानव स्वास्थ्य, नींद चक्र और हार्मोनल सिस्टम को भी प्रभावित करती है।
समाधान आसान, असर तेज
विशेषज्ञों का कहना है कि प्रकाश प्रदूषण कई अन्य जलवायु संकटों की तुलना में सबसे अधिक नियंत्रित किया जा सकने वाली समस्या है।



