दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां जलवायु परिवर्तन (Climate Change) अब भविष्य का नहीं, बल्कि वर्तमान का संकट बन चुका है। हालिया वैज्ञानिक अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन मौजूदा रफ्तार से जारी रहा, तो पृथ्वी का तापमान जल्द ही 1.5 डिग्री सेल्सियस की महत्वपूर्ण सीमा को पार कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति मानव सभ्यता, पर्यावरण और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर खतरे पैदा कर सकती है।
अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2025 में पृथ्वी का औसत तापमान औद्योगिक युग से पहले के स्तर की तुलना में लगभग 1.39 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस अतिरिक्त गर्मी का मुख्य कारण मानव गतिविधियां हैं, जिनमें जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) का बढ़ता उपयोग, औद्योगिक कार्बन उत्सर्जन और बड़े पैमाने पर वनों की कटाई शामिल है।
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विशेषज्ञों के मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों में ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार और तेज हुई है। यही वजह है कि अब 2030 से पहले 1.5°C की सीमा पार होने की आशंका पहले से कहीं अधिक वास्तविक नजर आ रही है। 2015 के पेरिस जलवायु समझौते (Paris Climate Agreement) में दुनिया के देशों ने तापमान वृद्धि को 2°C से नीचे और संभव हो तो 1.5°C तक सीमित रखने का लक्ष्य तय किया था।
रिपोर्ट में समुद्र स्तर में बढ़ोतरी को लेकर भी गंभीर चेतावनी दी गई है। 1901 के बाद से वैश्विक समुद्र स्तर लगभग 23 सेंटीमीटर बढ़ चुका है, जिससे तटीय क्षेत्रों पर खतरा लगातार बढ़ रहा है। वहीं समुद्रों का बढ़ता तापमान समुद्री लू (Marine Heatwaves) की घटनाओं को तेजी से बढ़ा रहा है, जिसका सीधा असर प्रवाल भित्तियों, मछलियों और समुद्री जैव विविधता पर पड़ रहा है। अध्ययन के अनुसार 1991 की तुलना में समुद्री लू वाले दिनों की संख्या तीन गुना से अधिक हो चुकी है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ती गर्मी, अनियमित बारिश, बाढ़, सूखा, समुद्र स्तर में वृद्धि और चरम मौसम की घटनाएं अब दुनिया के लगभग हर हिस्से में महसूस की जा रही हैं। इसका असर कृषि उत्पादन, खाद्य सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और मानव स्वास्थ्य पर भी साफ दिखाई देने लगा है।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि अभी भी हालात को पूरी तरह बिगड़ने से रोका जा सकता है। इसके लिए दुनिया भर के देशों को कार्बन उत्सर्जन में तेज कटौती, स्वच्छ ऊर्जा (Renewable Energy) को बढ़ावा और जलवायु निगरानी तंत्र को मजबूत बनाने की दिशा में तत्काल कदम उठाने होंगे।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है—क्या दुनिया जलवायु संकट को लेकर अभी भी पर्याप्त गंभीर नहीं है? क्या सरकारों और आम लोगों को अब पहले से कहीं अधिक सख्त कदम उठाने चाहिए?
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