अमेरिका के न्यूयॉर्क में आयोजित विशेष कार्यक्रम में मोहन भागवत का संबोधन काफी चर्चा में रहा। इस दौरान उन्होंने भारतीय प्रवासियों को अपनी कर्मभूमि के प्रति निष्ठावान रहने की सलाह दी। गौरतलब है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख ने भारतीय संस्कृति में विविधता के महत्व को भी रेखांकित किया।
मैडिसन स्क्वायर गार्डन में मोहन भागवत का संबोधन
दरअसल यह भव्य कार्यक्रम 29 अगस्त 2026 को न्यूयॉर्क के प्रसिद्ध मैडिसन स्क्वायर गार्डन के इन्फोसिस थिएटर में आयोजित हुआ। इस विशेष सभा का आयोजन गैर-लाभकारी संगठन ‘अमेरिकन हिंदूज फॉर एंगेजमेंट एंड डायलॉग’ द्वारा किया गया था।
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इस अवसर पर लगभग 5,000 से 6,000 भारतीय-अमेरिकी नागरिक और कई अंतर-धार्मिक नेता उपस्थित रहे। इसके अलावा बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीय भी इस ऐतिहासिक ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ का हिस्सा बने।

कर्मभूमि के प्रति निष्ठा और समर्पण का संदेश
इसके बाद उन्होंने प्रवासियों को संबोधित करते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने कहा कि अमेरिका में रहने वाले लोगों का पहला कर्तव्य उनकी कर्मभूमि के प्रति है।
इसलिए प्रवासियों को अमेरिका की प्रगति के प्रति पूरी तरह समर्पित और सच्चा रहना चाहिए। वहीं कर्मभूमि की जिम्मेदारियां निभाने के बाद अपनी जन्मभूमि भारत के संस्कारों को जीवित रखना भी जरूरी है।
- प्रवासियों का पहला कर्तव्य अपनी कर्मभूमि के प्रति निष्ठावान और सच्चा रहना है।
- विविधता कोई बाधा नहीं बल्कि एकता को निखारने वाला सुंदर श्रृंगार है।
- भारत का मूल उद्देश्य विश्व को विविधता में एकता की सीख देना है।
विविधता में एकता भारत का मूल डीएनए
बहरहाल उन्होंने अमेरिकी और भारतीय समाज की विशिष्टताओं पर भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिका की मूल पहचान बहुलवाद से जुड़ी है।
इसके विपरीत विविधता में एकता भारत के डीएनए में गहराई से समाहित है। इस बीच उन्होंने विविधता को एकता का सबसे सुंदर श्रृंगार करार दिया और इसका सम्मान करने का आह्वान किया।

स्वामी विवेकानंद के विचारों से मोहन भागवत का संबोधन
दरअसल अपने लगभग एक घंटे के वक्तव्य में उन्होंने स्वामी विवेकानंद के विचारों का प्रमुखता से उल्लेख किया। उन्होंने याद दिलाया कि प्रत्येक राष्ट्र का इस संसार में एक निश्चित उद्देश्य, संदेश और नियति होती है।
नतीजतन भारत की मूल नियति पूरी दुनिया को विविधता में एकता का सच्चा मार्ग दिखाना है। इसलिए हमारे प्राचीन ऋषियों ने भी विश्व कल्याण की भावना से कठिन तपस्या करके राष्ट्र का निर्माण किया था।
वैश्विक मंच पर भारतीय मूल्यों की प्रासंगिकता
हालांकि वैश्विक स्तर पर सांस्कृतिक संवाद को मजबूत करने की दिशा में यह व्याख्यान अत्यंत सार्थक माना जा रहा है। उन्होंने दोहराया कि विविधता कोई बाधा नहीं बल्कि उत्सव मनाने का एक अनुपम विषय है।
इसके अलावा विभिन्न संस्कृतियों के बीच आपसी सद्भाव बढ़ाना आज के दौर की सबसे बड़ी जरूरत बन चुका है। फिलहाल इस तरह के वैश्विक आयोजनों से दुनिया भर में भारतीय चिंतन का सकारात्मक संदेश प्रसारित हो रहा है।



