हुकमचंद मिल के श्रमिक अपने वैध हक के लिए बीते 33 वर्षों से लगातार कानूनी संघर्ष कर रहे हैं। दरअसल इंदौर की ऐतिहासिक मिल बंद होने के बाद हजारों परिवारों की रोजी-रोटी अचानक छिन गई थी। इसके बाद दशकों तक अदालती लड़ाई चली, लेकिन आज भी 380 पीड़ित परिवारों का इंतजार खत्म नहीं हुआ है।
1991 की अचानक तालाबंदी और हुकमचंद मिल के श्रमिक
गौरतलब है कि 12 दिसंबर 1991 को बिना किसी पूर्व सूचना के मिल में ताला लगा दिया गया था। इसके चलते कुल 5,895 कर्मचारी रातों-रात बेरोजगार होकर सड़क पर आ गए थे। नतीजतन इन कामगारों को अपने बुनियादी अधिकारों और बकाये के लिए तीन दशक से अधिक समय तक संघर्ष करना पड़ा।
👉 यह भी पढ़ें:
- इंदौर: लवकुश फ्लाईओवर की दूसरी भुजा सितंबर से खुलेगी, जाम से मिलेगी राहत
- इंदौर में सरकार पर बरसे उमंग सिंघार, बोले- छात्र हनुमान जैसे, लंका जलना तय
- एमपी पुलिस में 9,662 पदों पर भर्ती की तैयारी, सितंबर से शुरू हो सकती है प्रक्रिया
- एक्सपोर्ट हब योजना में शामिल हुआ इंदौर, स्थानीय उत्पादों के निर्यात को मिलेगी नई रफ्तार
- आखिर पिता दिग्विजय सिंह की विरासत कैसे संभाल पाएंगे जयवर्धन?
- मध्यप्रदेश में 32 आईएएस के तबादले, ग्वालियर और सतना के नगर निगम कमिश्नर बदले
इसके अलावा मिल की लगभग 41 एकड़ बेशकीमती जमीन के जरिए फंड जुटाने की विस्तृत रूपरेखा बनाई गई थी। हालांकि लंबी कानूनी औपचारिकताओं के कारण इस पूरी प्रक्रिया में कई दशक का समय बीत गया।

380 परिवारों की 80 करोड़ रुपये से अधिक की राशि लंबित
दरअसल स्थानीय प्रशासन और हाउसिंग बोर्ड ने अधिकांश कामगारों को उनके बकाये का भुगतान कर दिया है। इसके बावजूद 380 परिवारों की 80 करोड़ रुपये से अधिक की भारी राशि आज भी अटकी पड़ी है।
वहीं इन मामलों में मूल श्रमिक और उनकी पत्नी दोनों का पहले ही निधन हो चुका है। इसलिए अब उनके कानूनी वारिस अपने जायज हक के लिए लगातार दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।
मल्टीपल वारिसों के नियमों में उलझे हुकमचंद मिल के श्रमिक
इस बीच अदालती नियमों के तहत ऐसे मामलों को ‘थर्ड पार्टी वारिस’ की विशेष श्रेणी में रखा गया है। दरअसल एक से अधिक कानूनी वारिस होने की वजह से तकनीकी पेचीदगियां बढ़ गई हैं।
इसके बाद भी मध्य प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा गठित विशेष समिति ने अपने स्तर पर जांच पूरी कर ली थी। समिति ने सभी दस्तावेजों का गहन सत्यापन करके अंतिम सूची आधिकारिक परिसमापक को सौंप दी है।

दिसंबर 2023 के सरकारी समझौते के बाद की स्थिति
गौरतलब है कि 25 दिसंबर 2023 को सुशासन दिवस के मौके पर एक बड़ा सरकारी कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस दौरान प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री ने लगभग 224 करोड़ रुपये के सांकेतिक चेक के साथ वितरण शुरू किया था।
इसके तहत 4,500 से अधिक श्रमिकों और एकल वारिसों के बैंक खातों में राशि सीधे ट्रांसफर कर दी गई। हालांकि बहु-वारिसों वाले 380 परिवार आज भी अपने बकाये की राह देख रहे हैं। इस मामले के मुख्य पहलू इस प्रकार हैं:
- मूल कामगार और पत्नी दोनों के निधन के बाद उत्पन्न हुए कानूनी उत्तराधिकार के मामले।
- हाईकोर्ट की समिति द्वारा 380 परिवारों के सभी आवश्यक दस्तावेजों का सत्यापन।
- आधिकारिक परिसमापक के स्तर पर अंतिम मंजूरी और भुगतान का जारी इंतजार।
दफ्तरों के फेर में फंसा बुजुर्ग आश्रितों का हक
बहरहाल कई पीढ़ियां इस कानूनी प्रक्रिया को देखते-देखते अपनी उम्र के अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुकी हैं। इसलिए इन प्रभावित परिवारों की आर्थिक स्थिति आज भी बेहद गंभीर और चिंताजनक बनी हुई है।
फिलहाल पीड़ित परिवार शासन और प्रशासन से बची हुई भुगतान प्रक्रिया को जल्द पूरा करने की मांग कर रहे हैं। नतीजतन जब तक इन अंतिम परिवारों को भुगतान नहीं मिलता, तब तक यह संघर्ष पूरी तरह खत्म नहीं होगा।



