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-अर्द्धेन्दु भूषण
देश में आठवीं बार सबसे साफ शहर का खिताब जीत चुका इंदौर इन दिनों अपना दामन छुपाता फिर रहा है। सच ही तो है, इतने साफ शहर का पानी आखिर इतना गंदा कैसे हो सकता, जिससे 17-18 लोगों की जान चली जाए। लेकिन, भागीरथपुरा में ऐसा हुआ। जब ऐसा हो गया तो सूट-बूट में सजे-धजे स्वच्छता का अवॉर्ड लेने वाले नेताओं से लेकर फाइलें बगल में दबाकर बैठे अफसर तक बचने के रास्तें ढूंढ रहे हैं। मैंने सोचा भागीरथपुरा के पानी से ही बात कर ली जाए। आखिर बेचारा इतनी बदनामी जो झेल रहा है।
मैंने पूछा-तुम तो पूरे देश में नाम रोशन कर रहे हो। हर तरफ सिर्फ तुम्हारी ही चर्चा है।
बोला पानी-इसे तुम नाम रोशन करना कह रहे हो। यहां लोगों की जानें जा रही हैं और तुम्हें हंसी-ठिठोली सूझ रही है।
मैंने पूछा-भले ही तुम खलनायक बने हो, लेकिन चर्चा तो तुम्हारी ही हो रही है।
बोला पानी-ऐसी चर्चा किस काम की। जिस मालवा में कहावत है-पग-पग रोटी, डग-डग नीर। वहां अगर पानी की बदनामी हो जाए तो भला किसे अच्छा लगेगा।
मैंने पूछा-आखिर तुम इतने गंदे कैसे हो गए, जो लोगों की जान पर बन आई?
बोला पानी-तुम थोड़े पढ़े-लिखे हो भी या नहीं। वह गाना तो सुना ही होगा-पानी रे पानी तेरा रंग कैसा…अरे, मेरा न कोई रंग है, न जात-पात और न ही कोई धर्म। मैं तो पानी हूं, निर्मल पानी। अब मुझे जैसा बनाओगे, मैं तो वैसा ही रहूंगा।
मैंने पूछा-इतना बड़ा कांड करने के बाद भी प्रवचन दे रहो हो, तुम्हें शर्म-वर्म नहीं आती?
बोला पानी-तुम मुझे बेशर्म बोल रहे हो। उनसे पूछो न जिन्होंने मुझे गंदा बनाया। उनसे पूछो न, जिनको वोट देकर तुमने नेता महापौर, मंत्री और पार्षद बनाया। उनसे पूछो जो मेरी पाइप लाइन बदलने की फाइल दबाकर वर्षों बैठे रहे?
मैंने पूछा-नाराज मत हो, लेकिन थोड़ी जिम्मेदारी तो तुम्हारी भी बनती है।
बोला पानी-हां, सारी जिम्मेदारी तो मेरी ही है। वो जो बड़ी-बड़ी गाड़ियों में हूटर बजाए घूमते हैं-वे पाक साफ हैं। वे अफसर जो इंदौर आकर रातोंरात तिजोरियां भर लेते हैं, वे तो गाय के शुद्ध दूध से धुले हैं।
मैंने पूछा-उन पर तो कार्रवाई हो चुकी। खुद सीएम ने इन पर एक्शन लिया है। कई तो निलंबित भी हो गए और कुछ हटा दिए गए?
बोला पानी-मुझे तुम्हारी समझ पर तरस आता है। इन अफसरों का शहर से क्या लेना-देना। ये तो इंदौर को चारागाह समझ आते हैं, और अपना पेट भर चले जाते हैं। उन पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं हो रही, जो इस शहर के हैं। जिन्हें तुम लोगों ने चुना है और जो वर्षों से इंदौर की जिम्मेदारी लेकर बैठे हैं।
मैंने पूछा-वे नेता हैं। वे चुने हुए जनप्रतिनिधि हैं। उन पर सरकार कैसे कार्रवाई कर सकती है?
बोला पानी-क्यों नहीं हो सकती कार्रवाई? क्या उनकी कोई जवाबदारी नहीं। क्या अफसर बिना उनके इशारे पर काम कर सकते हैं? नगर निगम में तो एक फाइल भी उनकी इच्छा के बिना आगे नहीं बढ़ती।
मैंने कहा-सारे नेता तो यही कह रहे थे कि अधिकारी नहीं सुनते, फिर तुम ऐसी बात क्यो कर रहे हो? बेचारे सब असहाय थे, उनकी कोई गलती नहीं।
बोला पानी-यह सब चोचले हैं। सबको पता है कि कौन असहाय है। अगर अफसर मनमानी कर रहे थे, तो नेता क्या कर रहे थे? क्या शहर की जिम्मेदारी अफसरों की है? अगर अफसर आपकी नहीं सुनते तो कुर्सी क्यों नहीं छोड़ देते? आखिर जनता ने तो आपको अपने भले के लिए ही चुना है?
मैंने पूछा-कुर्सी छोड़ना इतना आसान नहीं होता। तुम्हें भी पता होगा कि कुर्सी पाने में कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं?
बोला पानी-तो मुझे इन घटनाओं के लिए दोषी न ठहराओ। जो कुर्सी नहीं छोड़ सकते, जो जनता की जान नहीं बचा सकते, जिन्हें इन घटनाओं पर शर्म भी नहीं आती, उनसे जाकर कहो-मेरी गंदगी में ही…।



