इंदौर। इंदौर की 13 गृह निर्माण सहकारी संस्थाओं के 52 ऑडिट नहीं हुए हैं। इन संस्थाओं के सदस्य प्लॉट के लिए दर-दर भटक रहे हैं, लेकिन सहकारिता विभाग के अधिकारी ध्यान नहीं देते। कलेक्टर शिवम वर्मा ने इस लापरवाही पर सहकारिता विभाग के उपायुक्त मनोज जायसवाल को कारण बताओ सूचना-पत्र जारी किया है।
कलेक्टर कार्यालय द्वारा जारी छह पृष्ठ के कारण बताओ नोटिस में कहा गया है कि योजना क्रमांक 171 से संबंधित गृह निर्माण सहकारी संस्थाओं के कामकाज को लेकर सदस्यों और हितबद्ध लोगों से लगातार शिकायतें प्राप्त होती रही हैं। साथ ही न्यायालयों से भी समय-समय पर निर्देश मिलते रहे हैं। नोटिस में संबंधित अधिकारी से प्रत्येक आरोप पर बिंदुवार और दस्तावेजों के साथ स्पष्टीकरण मांगा गया है।
13 संस्थाओं के 52 ऑडिट वर्ष अटके
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नोटिस के मुताबिक 13 गृह निर्माण एवं सहकारी संस्थाओं का ऑडिट लंबे समय से लंबित है। इनमें देवी अहिल्या श्रमिक कामगार सहकारी संस्था का ऑडिट वर्ष 2007-08 से 2024-25 तक यानी 18 वर्ष लंबित बताया गया है। इसी तरह संजय गृह निर्माण सहकारी संस्था का ऑडिट आठ वर्ष से लंबित है। अन्य संस्थाओं में न्याय विभाग कर्मचारी गृह निर्माण सहकारी संस्था का नौ वर्ष, मजदूर पंचायत गृह निर्माण सहकारी संस्था और रजत गृह निर्माण सहकारी संस्था का तीन-तीन वर्ष तथा कई अन्य संस्थाओं का एक से दो वर्ष का ऑडिट लंबित है। कुल मिलाकर 13 संस्थाओं के 52 ऑडिट वर्ष लंबित बताए गए हैं। कलेक्टर कार्यालय ने इसे महज एक वर्ष की चूक नहीं, बल्कि लगातार और संस्थागत स्तर की विफलता बताया है। नोटिस में संबंधित अधिकारी की जिले के विभागाध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारी का भी उल्लेख किया गया है।
जिम्मेदार ऑडिटरों की समीक्षा नहीं
नोटिस में यह भी आरोप लगाया गया है कि वर्षों तक ऑडिट लंबित रहने के बावजूद संबंधित ऑडिटरों को चिन्हित करने, उनके खिलाफ कार्रवाई प्रस्तावित करने अथवा इस मामले की नियमित समीक्षा करने संबंधी कोई कार्रवाई रिकॉर्ड पर नहीं लाई गई। कलेक्टर कार्यालय ने इसे पर्यवेक्षी दायित्व के निर्वहन में कमी माना है।
डायमंड गृह निर्माण का मामला भी गंभीर
कारण बताओ नोटिस में डायमंड गृह निर्माण सहकारी संस्था से जुड़ा न्यायालयीन मामला भी प्रमुखता से उठाया गया है। नोटिस के अनुसार नवम अपर सत्र न्यायाधीश, इंदौर के समक्ष चल रहे वाद क्रमांक 1100233/2010 में संस्था की अनियमितताओं से संबंधित जानकारी मांगी गई थी। इसके लिए 13 जुलाई 2026 को पत्र भेजकर तीन बिंदुओं पर जानकारी मांगी गई, लेकिन नोटिस जारी होने तक उसका जवाब प्राप्त नहीं हुआ। नोटिस में यह भी कहा गया है कि वर्ष 2024 से चल रहे एक सिविल मामले में सहकारिता विभाग या नियुक्त प्रशासक की ओर से संस्था के पक्ष में अब तक जवाबदावा प्रस्तुत नहीं किया गया। कलेक्टर कार्यालय ने इसे गंभीर स्थिति बताते हुए आशंका जताई है कि जवाब प्रस्तुत नहीं होने से संस्था के खिलाफ एकतरफा डिक्री पारित होने और उसकी भूमि अथवा संपत्तियों को नुकसान पहुंचने का जोखिम पैदा हो सकता है।
दस्तावेज और वरीयता सूची नहीं देने पर सवाल
नोटिस में आरोप है कि डायमंड गृह निर्माण सहकारी संस्था के दस्तावेज और ऑडिट रिपोर्ट भी बार-बार पत्राचार के बावजूद उपलब्ध नहीं कराई गईं। साथ ही 13 अन्य संस्थाओं, आदिनाथ गृह निर्माण सहकारी संस्था और डायमंड गृह निर्माण सहकारी संस्था के सदस्यों की वरीयता सूची से संबंधित जानकारी भी उपलब्ध नहीं कराए जाने का उल्लेख है। कलेक्टर कार्यालय के अनुसार गृह निर्माण सहकारी संस्थाओं में वरीयता सूची महत्वपूर्ण दस्तावेज है, क्योंकि इससे यह निर्धारित होता है कि पात्र सदस्यों को भूखंड आवंटन निर्धारित क्रम में हुआ या नहीं। नोटिस में कहा गया है कि वरीयता सूची का अभाव अनियमित अथवा बहु-आवंटन और बेनामी लेन-देन जैसी आशंकाओं को बढ़ा सकता है।
आदिनाथ संस्था के तीन पत्रों का जवाब नहीं
आदिनाथ गृह निर्माण सहकारी संस्था के संबंध में कलेक्टर कार्यालय द्वारा 24 दिसंबर 2025, 13 जनवरी 2026 और 19 मई 2026 को तीन अलग-अलग पत्र भेजे जाने का उल्लेख है। नोटिस के अनुसार करीब पांच महीने की अवधि में भेजे गए इन पत्रों पर न तो कोई जवाब प्रस्तुत किया गया और न ही की गई कार्रवाई से कार्यालय को अवगत कराया गया। इसके अलावा 13 जुलाई 2026 के स्मरण-पत्र के माध्यम से 18 सहकारी संस्थाओं की जांच से संबंधित जानकारी भी मांगी गई थी, जो नोटिस के मुताबिक उपलब्ध नहीं कराई गई।
कलेक्टर ने माना—लगातार होती रही चूक
कारण बताओ नोटिस में सबसे गंभीर टिप्पणी यह है कि अलग-अलग तारीखों पर बार-बार पत्र और स्मरण-पत्र भेजे जाने के बावजूद जवाब, दस्तावेज या कार्रवाई प्रस्तुत नहीं की गई। इन परिस्थितियों के आधार पर कलेक्टर कार्यालय ने प्रथम दृष्टया इसे आकस्मिक या एक बार हुई चूक के बजाय सतत और आदतन उपेक्षा, कर्तव्य-विमुखता तथा अनुशासनहीनता माना है।
वित्तीय अनियमितताओं पर कार्रवाई नहीं
नोटिस में कहा गया है कि 52 ऑडिट वर्ष लंबित रहने के कारण संबंधित संस्थाओं में हुई वित्तीय अनियमितताओं, गबन अथवा संपत्तियों के दुरुपयोग का समय पर पता नहीं चल सका। इसके चलते नुकसान की भरपाई से संबंधित कार्रवाई भी शुरू नहीं हो सकी। वहीं न्यायालय में जवाबदावा प्रस्तुत नहीं किए जाने से संस्था के खिलाफ एकतरफा डिक्री का जोखिम भी बताया गया है।
निलंबन की सिफारिश पर मांगा जवाब
कलेक्टर ने अधिकारी से यह भी स्पष्टीकरण मांगा है कि उनके खिलाफ मप्र सिविल सेवा नियमों के तहत विभागीय जांच क्यों न शुरू की जाए और गंभीर शास्ति के लिए प्रस्ताव सक्षम अनुशासनिक अधिकारी को क्यों न भेजा जाए। साथ ही अभिलेखों की सुरक्षा और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए निलंबन की सिफारिश क्यों न की जाए, इस पर भी जवाब मांगा गया है। न्यायालय के आदेश के पालन में कथित विफलता को न्यायालय के संज्ञान में लाने तथा पूरे मामले में भारतीय न्याय संहिता की धारा 198 के तहत कार्रवाई की संभावना की भी जांच किए जाने का उल्लेख नोटिस में है।
तीन दिन में व्यक्तिगत रूप से देना होगा जवाब
डिप्टी कमिश्नर से 13 संस्थाओं के 52 लंबित ऑडिट वर्षों को पूरा कराने के लिए दिनांकवार और समयबद्ध कार्ययोजना भी मांगी गई है। इसमें प्रत्येक संस्था के लिए नियुक्त ऑडिटर का नाम, आदेश क्रमांक, ऑडिट शुरू करने की तारीख और उसे पूरा करने की निश्चित तारीख बतानी होगी। इसके अलावा लंबित प्रत्येक ऑडिट वर्ष के लिए जिम्मेदार ऑडिटर और उसके खिलाफ की गई कार्रवाई का विवरण भी देना होगा। नोटिस के अनुसार अधिकारी को निर्धारित तारीख को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर लिखित जवाब और संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे। निर्धारित समय पर जवाब नहीं देने या जवाब असंतोषजनक पाए जाने पर उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर एकतरफा कार्रवाई किए जाने की चेतावनी दी गई है।



