Toxic : व्हिस्की की बोतल में ठर्रा

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– प्रकाश हिन्दुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार

कुछ फिल्में रिलीज़ होने के पहले ही इतनी चर्चा बटोर लेती हैं कि दर्शक फिल्म लगने के  पहले ही तय कर लेता है कि फिल्म देखनी ही है। फिल्म आने के पहले ही कियारा आडवाणी और यश के तबाही तबाही गाने की इंटिमेसी ने  सोशल मीडिया में तबाही मचा दी थी, जेन ज़ी और जेन अल्फ़ा के दर्शक बावले हो रहे थे, लेकिन फिल्म लगी तो दर्शकों ने कहा कि ठगा गये।   फिल्म से अच्छे तो इसके पोस्टर और ट्रेलर थे!

फिल्म का तीन घंटे चौदह मिनट का टॉक्सिक सफर महापकाऊ है। सिनेमावालों ने उसमें ट्रेलर और विज्ञापन जोड़ दिये और इंटरवल मिला लो तो सफर चार घंटे का है।  फिल्म का आधा समय तो हीरो के द्वारा किसी का हाथ, किसी गला, किसी की टांग काटने, गोली चलाने, बन्दूक, मोर्टार, बिग गन चलाने और चीखने में बीत जाता है। आधा घंटा वो किसी न किसी हीरोइन के साथ ( चार हैं) इंटिमेसी बनाने में लगा देता है।  स्क्रीन पर वह करीब करीब पूरा समय सिगरेट, शराब या सिगार पीने में  बिताता है।  डायलाग काम बोलता है- चीखता ज्यादा है! चीखता भी ऐसा है मानो सिनेमा का और दर्शक के कान का पर्दा फैट जाये।  कोई हॉल में सोना चाहे तो सो नहीं सकता !

फिल्म पुर्तगाली शासन के अधीन गोवा की पृष्ठभूमि में सत्ता, अपराध, सट्टा, विश्वासघात और हिंसा की दुनिया रचती है। फिल्म के पोस्टर और ट्रेलर से यह धारणा बनाई गई थी कि यह बहुत स्टाइलिश, धमाकेदार और हाई-वोल्टेज फिल्म होगी। हाईटेक VFX होंगे, बड़े-बड़े सेट होंगे और चार-चार हीरोइनें होंगी। यश इसमें राया ( राय नहीं) की भूमिका में हैं और साथ ही  बेटे टिकली की भूमिका में भी है। साथ में हैं कियारा आडवाणी, नयनतारा, हुमा कुरैशी, तारा सुतारिया, रुक्मिणी वसंत, अक्षय ओबेरॉय आदि ।

यश की स्क्रीन प्रेजेंस में कोई कमी नहीं है। वह पर्दे पर आते हैं तो पर्दा भी जैसे थोड़ा संभलकर खड़ा होता है।लेकिन सिर्फ स्टारडम से कहानी नहीं चलती। यहां कहानी इतनी झूलती रहती है कि कई बार समझना मुश्किल हो जाता है कि आखिर फिल्म जाना कहां चाहती है। हाई-ऑक्टेन एक्शन, गोलियां, खूनखराबा और थोपी हुई इंटीमेसी और रिश्तेदारियों में  कहानी का ही दम घुट जाता है।

लेकिन समस्या यह है कि  रिश्ते बहुत हैं, रिश्ता कोई नहीं बनता।

नयनतारा यश की बहन गंगा बनी हैं। कियारा आडवाणी का किरदार केवल अंग प्रदर्शन का है।  तारा सुतारिया और हुमा कुरैशी को भी यश  पीछे होना है, बेचारा अकेला किस  थामे? फिल्म की मूल संवेदना आखिरकार पुरुष सत्ता, अपराध और हिंसा के इर्द-गिर्द ही घूमती रहती है।

कुछ डायलाग  जरूर याद रह जाते हैं, जैसे –

  – ”वायलेंस इज़ माय मदर टंग!”

 – “अगली बार जब तुम मुझसे मिलो तो आशिक की तरह मिलना, मालिक की तरह नहीं।”

 – “मौत जिंदगी जितनी बदसूरत नहीं होती।”

 – ”जिंदगी की कीमत तब होती है जब कोई जान से प्यार करता है।”

 – “मुझे मोरैलिटी से एलर्जी है।”

 – “आई लव यू? …..वाह, तो हम दोनों की पसंद एक है, क्योंकि मुझे भी मुझसे बहुत ज्यादा प्यार है।”

 – “बदला लेने की कोई दिशा नहीं होती।”

और यह संवाद तो फिल्म के पूरे दर्शन को जैसे एक ही वाक्य में समेट देता है :

 – “लोग एक-दूसरे से लड़कर ऊपर जाते हैं, हम एक-दूसरे के ऊपर चढ़कर जाएंगे।”

इन संवादों में फिल्म का अंदाज, उसकी हिंसक मानसिकता और उसका अंधेरा संसार दिखाई देता है। Fairy Tale नहीं, Bloody Tale! फिल्म का पूरा नाम है—Toxic: A Fairy Tale for Grown-Ups. लेकिन यह कोई परी-कथा नहीं है। यह केवल गोलियों की गूंज,  खूनखराबा, हिंसा का स्टाइल और बड़े-बड़े सेटों की कहानी है।

यहाँ गोवा का समुद्र तट है। कैसीनो है। बंदरगाह है। कब्रिस्तान है। अपराध है। सट्टे की लड़ाई है। रिश्तों का धोखा है। हर तरफ हिंसा का धुआं है। हर तरफ अंधेरा है।

इतने बड़े कैनवस पर आखिर चित्र क्या बनाया गया है? इंटरवल में ही कहानी खत्म! फिल्म में इतने सारे पात्र हैं कि कई बार लगता है कि इनके होने या न होने से कहानी को क्या फर्क पड़ता है?  सेकंड हाफ में दर्शक की फिर से नई परीक्षा शुरू होती है।कहानी का धागा  टूटता है और दर्शक की नजर फिल्म के पर्दे से ज्यादा बाहर निकलने के रास्ते पर होती है।

केवल खूबसूरत प्लेट में खाना परोस देने से खाना स्वादिष्ट नहीं हो जाता।  व्हिस्की की  महंगी  बोतल में ठर्रा टिका दिया भिया ! विजुअल्स  शानदार हैं। सेट बड़े हैं। कैमरा खूबसूरत है। सिनेमैटोग्राफी आकर्षक है। निर्देशक ने फिल्म का माहौल बनाने में पूरी ताकत लगा दी है, लेकिन कहानी पर उतना ध्यान नहीं दिया।

इस फिल्म का सबसे अच्छा हिस्सा उसके ट्रेलर में है।  बस !

यह फिल्म हिन्दी दर्शकों के लिए टॉर्चर है।   जाना हो तो अपनी रिस्क पर ! अझेलनीय !

Toxic : व्हिस्की की बोतल में ठर्रा

– प्रकाश हिन्दुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार

Ardhendu Bhushan - Consulting Editor
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Ardhendhu Bhushan is a senior consulting editor with extensive experience in the media industry. He is recognized for his sharp editorial insight and strategic guidance.

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