सौरव गांगुली को लेकर चल रहे 2003 के प्लेयर एग्रीमेंट विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए गांगुली को बड़ी राहत दी है। इस फैसले से जुड़े इस कानूनी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने परसेप्ट टैलेंट मैनेजमेंट की अपील खारिज कर दी, जिससे ₹14.49 करोड़ का विवाद खत्म हो गया।
सुप्रीम कोर्ट ने 2003 के प्लेयर एग्रीमेंट विवाद में दिया फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर 2026 को 2003 के प्लेयर एग्रीमेंट विवाद में सौरव गांगुली को राहत दी। इस मामले में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने परसेप्ट टैलेंट मैनेजमेंट की अपील को खारिज किया। कोर्ट ने ₹14.49 करोड़ के आर्बिट्रल अवॉर्ड को बरकरार रखा जो गांगुली के पक्ष में था। यह फैसला गांगुली के लिए न्यायसंगत माना जा रहा है।
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2003 प्लेयर एग्रीमेंट से विवाद की शुरुआत
यह विवाद 22 अक्टूबर 2003 को सौरव गांगुली और परसेप्ट टैलेंट मैनेजमेंट के बीच हुए प्लेयर रिप्रेजेंटेशन एग्रीमेंट से शुरू हुआ था। इस समझौते के तहत परसेप्ट को गांगुली के व्यावसायिक और प्रचार संबंधी अधिकारों का प्रबंधन करने का विशेष अधिकार दिया गया था।
समझौते में यह शर्त भी थी कि यदि गांगुली छह महीने तक भारतीय टीम से बाहर रहते हैं, तो कंपनी अनुबंध समाप्त कर सकती है। फरवरी 2006 में टीम से बाहर होने के बाद 1 अगस्त 2006 को यह अवधि पूरी हुई, लेकिन गांगुली की वापसी के बाद भी कंपनी ने उनका प्रतिनिधित्व जारी रखा।
टर्मिनेशन नोटिस और विवाद की मुख्य वजह
परसेप्ट ने 21 नवंबर 2007 को गांगुली को टर्मिनेशन नोटिस भेजा, लेकिन आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल ने माना कि कंपनी ने टर्मिनेशन का अधिकार खो दिया क्योंकि उसने गांगुली का प्रतिनिधित्व तब भी जारी रखा जब वह टीम में वापस आ चुके थे।
ट्रिब्यूनल ने यह भी माना कि गांगुली को मिनिमम गारंटी का भुगतान नहीं किया गया और एस्क्रो अकाउंट से अनधिकृत निकासी हुई। इसलिए गांगुली के पक्ष में ₹14.49 करोड़ का अवॉर्ड दिया गया।

कलकत्ता हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल के फैसले को पहले कलकत्ता हाई कोर्ट ने भी बरकरार रखा था। इसके खिलाफ परसेप्ट ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई में वरिष्ठ अधिवक्ता नकुल दीवान और गौरब बनर्जी को सुनवाई के लिए पेश किया।
सुप्रीम कोर्ट ने अंततः परसेप्ट की अपील खारिज करते हुए आर्बिट्रल अवॉर्ड को मजबूती से स्थापित किया। इस फैसले से गांगुली को कानूनी तौर पर राहत मिली है।
कोलकाता नाइट राइडर्स की आय विवाद से अलग रखी गई
परसेप्ट का तर्क था कि आईपीएल की फ्रेंचाइजी कोलकाता नाइट राइडर्स से गांगुली की आय को भी इस समझौते में शामिल किया जाना चाहिए। हालांकि, अदालत ने माना कि केकेआर से आय क्रिकेट खेलने से संबंधित है, न कि व्यक्तिगत प्रचार से। इसलिए इसे इस विवाद से अलग रखा गया।
इस फैसले से स्पष्ट हो गया कि खेल से संबंधित आय और व्यक्तिगत प्रचार से संबंधित अधिकार अलग-अलग माने जाएंगे। अदालत ने इस पहलू पर भी गांगुली के पक्ष में निर्णय दिया।
आगे की संभावना और प्रभाव
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से गांगुली का कानूनी विवाद समाप्त हो गया है। यह निर्णय खेल और प्रबंधन की दुनिया में अनुबंधों की व्याख्या के लिए मिसाल बनेगा।
आम जनता के लिए यह मामला यह समझने में मददगार होगा कि खिलाड़ियों के व्यावसायिक अधिकारों और खेल गतिविधियों के दायरे को अदालत कैसे देखती है। भविष्य में इस तरह के विवादों में स्पष्ट समझौते और उनकी पालना पर अधिक ध्यान दिया जाएगा।



