इंदौर। कर्मचारीगण गृह निर्माण संस्था की वरीयता सूची का विवाद अब हाईकोर्ट पहुंच गया है। हाईकोर्ट ने वरीयता सूची को चुनौती देने वाली एक याचिका की सुनवाई करते हुए रजिस्ट्रार से कहा है कि वह सही वरिष्ठता सूची की जांच करें और अगली सुनवाई की तारीख पर या उससे पहले उसे जमा करें। इससे पहले भी हाईकोर्ट ने एक अन्य याचिका पर इसी तरह के आदेश दिए थे।
कोर्ट ने दिए यह आदेश
हाईकोर्ट में अशोक कुमार की तरफ से दायर एक याचिका की सुनवाई करते हुए 5 जून को न्यायमूर्ति राजेश कुमार गुप्ता ने इस संबंध में आदेश दिए हैं। आदेश में रजिस्ट्रार, सहकारी समिति, इंदौर को निर्देश दिया जाता है कि वे मामले से संबंधित सही वरिष्ठता सूची की जांच करें और अगली सुनवाई की तारीख पर या उससे पहले उसे जमा करें।
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प्रतिवादियों को किए नोटिस जारी
कोर्ट ने आदेश में कहा है कि प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया जाए; इसके लिए दस कामकाजी दिनों के भीतर प्रोसेस फीस का भुगतान करके स्पीड पोस्ट से नोटिस भेजा जाए, जो चार सप्ताह के भीतर वापस आना चाहिए। ऐसा न करने पर, बेंच को दोबारा मामला भेजे बिना याचिका अपने आप खारिज हो जाएगी।
19 मई के आदेश पर बनी रहेगी रोक
कोर्ट ने आदेश में कहा है कि अंतरिम उपाय के तौर पर, यह निर्देश दिया जाता है कि 19.05.2026 के विवादित आदेश पर रोक बनी रहेगी और आदेश (एनेक्शर P/24) को लागू नहीं किया जाएगा, साथ ही याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं की जाएगी। प्रतिवादी नंबर 1 को यह भी निर्देश दिया जाता है कि वह प्रतिवादी नंबर 6 / सोसाइटी के खिलाफ की गई जांच रिपोर्ट और शिकायतों के संबंध में स्पष्टीकरण दे और उक्त प्रतिवादी यह भी बताए कि अब तक उसके खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है। कोर्ट ने कहा है कि चूंकि इसी तरह का मामला WP नंबर 40416/2025 मौजूदा मामले के मुद्दे से जुड़ा है, इसलिए इस मामले को उक्त WP और 9139/2026 के साथ सूचीबद्ध किया जाए।
पहले चौरसिया की याचिका पर हुए थे आदेश
इससे पहले हाईकोर्ट ने संस्था की सदस्य सुशीला चौरसिया की याचिका पर सुनवाई करते हुए फिलहाल वरीयता सूची के आधार पर प्लॉट का आवंटन रोक दिया है। हाईकोर्ट ने सहकारिता विभाग, इंदौर विकास प्राधिकरण तथा अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस भेजकर जवाब मांगा है। संस्था की सदस्य सुशीला चौरसिया की याचिका पर सुनवाई करते हुए फिलहाल वरीयता सूची के आधार पर प्लॉट का आवंटन रोक दिया है। हाईकोर्ट ने सहकारिता विभाग, इंदौर विकास प्राधिकरण तथा अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस भेजकर जवाब मांगा है।
चौरसिया ने अपनी याचिका में क्या कहा था
उल्लेखनीय है कि सुशीला चौरसिया ने अपनी याचिका में कहा था कि जब तक इस याचिका का अंतिम निपटारा नहीं हो जाता, तब तक प्रतिवादी आईडीए को विवादित वरिष्ठता सूची के अनुसार भूखंडों का हस्तांतरण/आवंटन करने से रोका जा। याचिका में संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ शुरू की गई जांच पर आवश्यक कार्रवाई करने की मांग भी की गई थी। इसके साथ ही अब तक क्या कार्रवाई की गई है, इस बारे में स्टेट्स रिपोर्ट मंगाने की बात भी कही गई थी।
सुशीला चौरसिया ने लगाए थे ये आरोप
– दिनांक 22.03.2004 के पत्र के माध्यम से, तत्कालीन संयुक्त रजिस्ट्रार, सहकारी समितियां, इंदौर ने समिति के 80 सदस्यों की एक सूची प्रतिवादी संख्या 7 (I.D.A.) को भेजी। उक्त सूची में याचिकाकर्ता का नाम क्रम संख्या 55 पर अंकित है।
– IDA से भूखंडों के आवंटन के लिए एक नई वरिष्ठता सूची प्रकाशित की थी। विशेष रूप से, उक्त सूची में याचिकाकर्ताओं के नाम वरिष्ठता सूची से अवैध रूप से हटा दिए गए थे। उन व्यक्तियों के नाम, जो सोसाइटी के पूर्व अध्यक्ष आर.डी. शेगांवकर के साथ अच्छे संबंधों में थे, अवैध और मनमाने ढंग से उक्त सूची में शामिल कर लिए गए थे।
– प्रकाशन को देखने के बाद, वर्तमान याचिकाकर्ताओं ने मामले की जांच की और पाया कि 25.11.2024 को प्रतिवादी संख्या 4 (आशीष सेठिया और आर.एस. गारेथिया), जो विभाग के ऑडिटर थे, ने एक नई वरिष्ठता सूची प्रकाशित की थी और प्रतिवादी संख्या 6 सोसाइटी के खातों का ऑडिट किया था। उक्त ऑडिट करने से पहले और वरिष्ठता सूची तैयार करने से पहले, वर्तमान याचिकाकर्ताओं को, और साथ ही सोसाइटी के उन अन्य सदस्यों को भी, जिनके नाम अवैध रूप से हटा दिए गए थे, कोई नोटिस/सूचना जारी नहीं की गई थी।
– संयुक्त रजिस्ट्रार (सहकारी विभाग) ने जानबूझकर उपरोक्त तथ्यों की अनदेखी की और प्रतिवादी संख्या 7 – CEO, इंदौर विकास प्राधिकरण को प्लॉटों के आवंटन के लिए दिनांक 11.12.2025 का एक पत्र जारी किया, जिसके द्वारा पत्र के साथ अवैध रूप से एक नई सूची संलग्न कर दी।
कोर्ट के नाम पर गुमराह करते रहे विभाग
इस मामले में वर्षों से सरकारी विभाग कोर्ट के नाम पर गुमराह करते रहे हैं। सहकारिता विभाग ने कोर्ट की आड़ में वरीयता सूची फाइनल कर गेंद इंदौर विकास प्राधिकरण के पाले में डाल दी थी। सहकारिता विभाग ने सूची फाइनल कर कोर्ट को तो दे दी, लेकिन यह नहीं बताया कि इसको लेकर कितने केस पेंडिंग है। ईओडब्ल्यू की जांच तक को छुपा लिया गया है।
विभागीय अधिकारी से लेकर भूमाफिया तक सक्रिय
सूत्र बताते हैं कि इस पूरे मामले में कुछ भूमाफिया और सहकारिता विभाग के पूर्व उप अंकेक्षक आनंद पाठक का खेल है। वरीयता सूची का मामला लंबे समय से विवादों में है। इस पर ईओडब्लू से लेकर सहकारिता विभाग में ही कई केस चल रहे हैं। मामले की जांच-पड़ताल चल रही है। इस बीच सहकारिता विभाग ने बड़ी ही चालाकी से हाईकोर्ट में चल रहे एक मामले की आड़ में वरीयता सूची सौंप दी थी। हाईकोर्ट ने इंदौर विकास प्राधिकरण को आदेश दिए कि इस सूची के आधार पर प्लॉट का आवंटन 24 नवंबर तक कर दे।
सदस्यों से पैसे की भी हुई वसूली
सूत्र बताते हैं कि वरीयता सूची के लिए प्रति सदस्य 20-20 लाख रुपए की वसूली भी की गई है। यह सहकारिता से लेकर संबंधित विभागों के अधिकारियों के नाम पर वसूली गई है। यह वसूली भूमाफिया, उसके गुर्गों और सहकारिता विभाग के कुछ अधिकारियों द्वारा की गई है।
डीआर को सूची जारी करने का अधिकार नहीं था
सूत्र बताते हैं कि सहकारिता विभाग के एक आदेश के अनुसार डीआर को वरीयता सूची जारी करने का अधिकार ही नहीं है। इस संबंध में जेआर ने डीआर को एक सर्कुलर भी जारी किया था, लेकिन डीआर ने उसकी भी अनदेखी कर दी और बाले-बाले सारे खेल कर दिए और कोर्ट का डर दिखाकर आईडीए को फंसा दिया।
आईडीए ने संयुक्त आयुक्त को वापस की थी सूची
आईडीए ने यह सूची संयुक्त आयुक्त को वापस कर दी है। आईडीए ने कहा है कि यह सूची सहकारिता उपायुक्त ने भेजी है और इसमें संयुक्त आयुक्त की अनुशंसा नहीं है। इसलिए आप अनुशंसा कर फिर से सूची भेजें। आईडीए पहले भी यह सूची संयुक्त आयुक्त को वापस कर चुका है। आईडीए सीईओ ने 22 अप्रैल 26 को संयुक्त आयुक्त को लिखे पत्र में कहा है कि हाईकोर्ट इन्दौर द्वारा योजना कमांक 114 भाग-2 में कर्मचारी गृह निर्माण सहकारी संस्था मर्यादित इन्दौर को प्राप्त होने वाले 81 भूखण्डों के विरूद्ध 72 पात्र भूखण्डधारी संस्था सदस्यों की वरीयता सूची भेजी गई है। इस वरीयता सूची में आपके द्वारा अनुशंसा नहीं की गई है, केवल उपायुक्त, सहकारिता की सूची को मूलतः प्रेषित किया गया है। उक्त वरीयता सूची को आप अपनी अनुशंसा सहित फिर से भेजें।
भू-अर्जन अधिकारी ने निकलवा दी थी डिमांड
आईडीए के विधि एवं भू अर्जन अधिकारी सुदीप मीणा ने इसी सूची को मान्यता देते हुए डिमांड जारी करवा दिया था। कर्मचारीगण गृह निर्माण संस्था के अध्यक्ष आरडी शेगांवकर को 5 मार्च 25 को एक पत्र लिखा था। इसमें कोर्ट के आदेशों का हवाला देते हुए कहा गया है कि प्राधिकरण द्वारा पत्र कमांक 4539 3 दिसंबर 2020 से माह नवम्बर, 2020 की स्थिति में संस्था को राशि 3,57,21,909 रुपए की डिमाड जारी की गई थी, किन्तु संयुक्त आयुक्त, सहकारिता द्वारा संस्था की वरीयता सूची नहीं देने से संस्था द्वारा दी गई राशि वापस कर दी गई थी। अब संयुक्त आयुक्त, सहकारिता, इन्दौर द्वारा वरीयता सूची प्राधिकारी को भेजी गई है। अत: मार्च-2026 की स्थिति में देय राशि 8,22,36,836 रुपए प्राधिकारी कोष में जमा करा दें। इस पत्र में सूची सत्यापन के लिए कुछ स्पष्टीकरण भी मांगा गया था।


