इंदौर। संभागायुक्त सुदाम खाड़े का इंदौर से ट्रांसफर हो गया है। यहां से जाने से पहले जमीनों के मामले में उनके कुछ फैसले चर्चा में बने हुए हैं। पहला मामला स्वतिक ग्रैंड कॉलोनी का था। अब दूसरा मामला पिनेकल द ग्रैंड कॉलोनी का है। इन दोनों फैसलों से प्लॉटधारकों को तो नहीं, लेकिन भूमाफियाओं को बड़ी राहत मिली है।
टीएनसीपी के आदेश को किया निरस्त
उल्लेखनीय है कि हाईकोर्ट के आदेश पर सुनवाई के बाद टीएंडसीपी ने पिनेकल द ग्रैंड का नक्शा रद्द कर दिया था। कॉलोनाइजर ने इसके खिलाफ तत्कालीन संभागायुक्त सुदाम खाड़े के यहां अपील की। खाड़े ने टीएंडसीपी का आदेश रद्द कर कॉलोनाइजर को राहत दे दी।
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प्लॉट की उम्मीद लगाए लोगों को निराशा
संभागायुक्त के इस फैसले से वर्षों से प्लॉट की उम्मीद लगाए लोगों को काफी निराशा हुई है। ये लोग कलेक्टर की जनसुनवाई से लेकर भोपाल तक और थक हार कर हाईकोर्ट तक की दौड़ लगा चुके हैं। तत्कालीन संभागायुक्त के इस फैसले से सबकी मेहनत पर पानी फिर गया है।
नक्शा पास होते ही बेच दी थी जमीन
निपानिया के सर्वे नंबर- 260/1, 261/1, 261/2, 264/1 की 8.991 हेक्टेयर जमीन में से आइडीए की योजना में शामिल 0.680 हेक्टेयर जमीन को छोड़कर बाकी 8.311 हेक्टेयर जमीन पर टीएंडसीपी ने 25 नवंबर 2014 को नक्शा पास किया था। इसके बाद यहां प्लॉट बेचे जाने चाहिए थे, लेकिन कॉलोनाइजर ने सर्वे नंबर- 261/1 पैकी की 1.615 हेक्टेयर जमीन जेएसएम देवकॉन को और सर्वे नंबर-261/2 की 2.148 हेक्टेयर जमीन श्री जेएसएम देवकॉन इंडिया को बेच दी थी।
शिकायत पर रद्द हो गई थी अनुमति
इस कॉलोनी में प्लॉट की उम्मीद लगाए बैठे लोगों का कहना था कि ऐसा नहीं किया जा सकता। नगर निगम में शिकायत की गई। इसके बाद विकास अनुमति रद्द हो गई। इसके बाद हाइकोर्ट में याचिका लगाई गई। हाईकोर्ट के निर्देश पर टीएंडसीपी के संयुक्त संचालक शुभाशीष बैनर्जी ने 12 फरवरी 2026 को नक्शा रद्द कर दिया था।
संभागायुक्त के दरबार में पहुंचे कॉलोनाइजर
इसके बाद कॉलोनाइजर नीना पति संजय अग्रवाल, रितु पति मनोज अग्रवाल और आम मुख्तियार संजय पिता दीनानाथ अग्रवाल ने इसे संभागायुक्त न्यायालय में चुनौती दी। तत्कालीन संभागायुक्त सुदाम खाड़े ने दोनों पक्षों को सुना और 22 जुलाई 2026 को फैसला सुनाते हुए टीएंडसीपी के जेडी का आदेश निरस्त कर दिया। यही नहीं अपीलीय न्यायालय ने जो स्थगन आदेश दिया था, वो भी रद्द कर दिया। आदेश के मुताबिक सक्षम प्राधिकारी मौके पर जाकर यह देखने के लिए आजाद हैं कि नियमानुसार विकास के काम हुए हैं या नहीं। वहीं पक्षकार यदि संभागायुक्त न्यायालय के आदेश से असंतुष्ट हैं तो मध्यप्रदेश नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम, 1973 की धारा 32 में प्रमुख सचिव, आवास एवं पर्यावरण विभाग के यहां पुनरीक्षण याचिका लगा सकते हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बनाया आधार
बताया जाता है कि कॉलोनाइजर की तरफ से दिल्ली हाईकोर्ट के किसी फैसले को आधार बनाया गया था, जिसमें कहा गया था कि नक्शा पास होने के 12 साल बाद अनुमति निरस्त नहीं हो सकती। इस मामले में कॉलोनाइजर ने 2014 में नक्शा पास होने के बाद 2015 में ही जमीन बेच दी थी। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि इस तरह दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला इस मामले में लागू ही नहीं होता।
स्वस्तिक ग्रैंड कॉलोनी में भी हुआ था खेल
तत्कालीन संभागायुक्त सुदाम खाड़े का एक और फैसला विवादों में है। यह मामला है स्वतिक ग्रैंड कॉलोनी का। इसमें कलेक्टर शिवम वर्मा ने सारी अनुमतियां निरस्त कर दी थीं, लेकिन तत्कालीन संभागायुक्त सुदाम खाड़े ने कलेक्टर के आदेश पर ही रोक लगा दी। 8 जनवरी 2025 को कॉलोनी सेल ने इस कॉलोनी को विकास की अनुमति दे दी। इतना ही नहीं, कुछ महीने बाद जून 2025 में रेरा ने भी इस प्रोजेक्ट को पंजीकृत कर दिया था। शिकायत और जांच रिपोर्ट के आधार पर इंदौर कलेक्टर शिवम वर्मा ने कॉलोनी सेल विभाग के प्रभारी अपर कलेक्टर रिंकेश वैश्य को अनुमति निरस्त करने के निर्देश दिए। इसके बाद एडीएम रिंकेश वैश्य ने स्वस्तिक ग्रैंड कॉलोनी की विकास अनुमति को औपचारिक रूप से निरस्त कर दिया, और रेरा तथा पंजीयन विभाग को पत्र लिखकर वहां रजिस्ट्री रोकने के निर्देश दिए। सुदाम खाड़े ने अपनी ताकत दिखाते हुए कलेक्टर के आदेश पर ही रोक लगा दी थी।



