सीएम की सख्ती के बाद भी नहीं मान रहे अफसर, भूमाफियाओं के साथ मिलकर सरकारी योजनाओं की लगा रहे बाट–हरीश फतेहचंदानी

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इंदौर। इंदौर में जमीन के जादूगर बेखौफ सरकार और जनता को चूना लगाते रहते हैं। कई बार इन पर कार्रवाई की कोशिश हुई, लेकिन बड़े रसूख वाले नेताओं ने इन्हें बचा लिया और ये फिर सरकार और जनता को चूना लगाने में जुट गए। सीएम डॉ.मोहन यादव के भूमाफियाओं के खिलाफ सख्त रवैये के बावजूद इनकी जादूगरी चल रही है। इंदौर विकास प्रधाकिरण (आईडीए) की कई योजनाओं का सत्यनाश करने के बाद इन्होंने नई योजना अहिल्यापथ को कागजों पर ही दफन करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसके बाद भी इनका मन नहीं भरा तो अब ये मास्टर प्लान का सत्यानाश करने में जुट गए हैं।

अहिल्यापथ में आखिर दिन तक पास हुए नक्शे

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अभी जुलाई महीने में ही आईडीए ने अहिल्यापथ नाम की योजना घोषित की। 8 गांवों की 1400 हेक्टेयर जमीन पर यह योजना तैयार हो रही थी कि आईडीए के कंसल्टेंट मयंक जगवानी ने अपने भूमाफिया दोस्तों और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग में तैनात साझेदार डिप्टी डायरेक्टर केएस गवली के माध्यम से जमीनों को ठिकाने लगा दिया। स्कीम घोषित होने से पहले ही धड़ल्ले से नक्शे पास किए जाने लगे। यहां तक कि आईडीए जिस दिन स्कीम घोषित करने वाला था उस दिन भी 7 नक्शे दबावपूर्वक पास कराने की कोशिश हुई। वो तो भला हो टीएनसीपी के ज्वाइंट डायरेक्टर शुभाशीष बेनर्जी का जो उन्होंने नक्शे पास नहीं होने दिए।

ऊपर से दवाब बना तो 31 नक्शे निरस्त

अहिल्यापथ के खेल की जानकारी भोपाल तक पहुंच गई। इंदौर के अधिकारियों को भी इसकी जानकारी लग गई थी और टीएनसीपी की कार्यप्रणाली पर सवाल भी उठाए जाने लगे थे। जब ऊपर से दवाब बना तो आईडीए के वर्तमान अध्यक्ष और संभागायुक्त दीपक सिंह ने इन नक्शों को निरस्त करने की अपील की। पहली बार में ही 23 नक्शे निरस्त हो गए। इसके बाद 4-4 नक्शे और भेजे गए, वे भी निरस्त हो गए।

जगवानी और गवली अब दे रहे ज्ञान

आईडीए से बिल्डर तक योजना पहुंचाने और नक्शा पास कराने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले आईडीए के कंसल्टेंट मयंक जगवानी, टीएनसीपी के डिप्टी डायरेक्टर केएस गवली और आईडीए सीईओ के बेहद विश्वासप्राप्त ब्रोकर अतुल काकड़िया फिर भी नहीं मान रहे। अभी भी वे अपने भूमाफिया दोस्तों से यह कह रहे हैं कि इससे कुछ नहीं होगा। नक्शा वैध तरीके से पास कराया गया है। कोर्ट चले जाओ, आईडीए हार जाएगा।

आईडीए सीईओ की भूमिका संदिग्ध

इस पूरे प्रकरण में आईडीए सीईओ ओपी अहिरवार की भूमिका भी संदिग्ध है। जब अहिल्यापथ मामले में आईडीए की नाक कटने लगी और अहिरवार को लगा कि वे भी फंस सकते हैं तो उन्होंने मयंक जगवानी से इस्तीफा लिखवाकर अपने पास रख लिया। हाल ही में अहिरवार ने जगवानी से तीन साल का कान्ट्रैक्ट भी किया था। यहां सवाल यह है कि अगर सीईओ अहिरवार का दामन साफ है तो वे मयंक जगवानी के खिलाफ एफआईआर क्यों नहीं कराते? बाहर का एक व्यक्ति कंसल्टेंट बन हर महीने चार लाख 80 हजार लेकर आईडीए और सरकार को करोड़ों का चूना लगा जाता है और कार्रवाई के नाम पर सिर्फ इस्तीफा समझ से परे हैं।

नियमों में बदलाव क्यों नहीं होता

कुछ समय पूर्व जब इस संबंध में टीएंडसीपी के ज्वाइंट डायरेक्टर शुभाशीष बेनर्जी से चर्चा की गई थी तो उन्होंने कहा कि जब तक आईडीए लिखित में नहीं देता, तब तक किसी नक्शे को रोका नहीं जा सकता। नियमों में यह भी प्रावधान है कि जब तक योजना घोषित नहीं होती तब तक नक्शे पास हो सकते हैं। ऐसे तो आईडीए कोई स्कीम लागू ही नहीं कर पाएगा। आईडीए की कई स्कीमों में इससे नुकसान हुआ भी है, लेकिन इसकी चिन्ता न तो आईडीए अफसरों को है और न टीएंडसीपी के अफसरों को। वे नियमों में बदलाव के लिए सरकार को प्रस्ताव क्यों नहीं भेजते?

अधिकारियों की चुप्पी से उठ रहे कई सवाल

इस पूरे मामले में अधिकारियों की चुप्पी कई सवाल भी उठा रही है और कई सवालों का जवाब भी दे रही है। आईडीए सीईओ गुपचुप तरीके से जगवानी का इस्तीफा लेते हैं और कार्रवाई को दबाना चाहते हैं। आईडीए की हर बोर्ड बैठक में जब सारे अधिकारी रहते हैं, तब भी इस मुद्दे पर सीईओ ने कुछ नहीं बोला। यहां सवाल यह भी है कि इन बैठकों में उपस्थित विभागों में आपसी समन्वय क्यों नहीं होता? अगर सीईओ का दामन साफ था तो उन्होंने अपने वरिष्ठ अधिकारियों से शिकायत क्यों नहीं की?

मास्टर प्लान की जमीनों पर भी खेल जारी

अहिल्यापथ के बाद अब मास्टर प्लान की बाट लगाने की तैयारी चल रही है। मास्टरप्लान में कहां क्या तय हो रहा है यह किन-किन अधिकारियों को पता होता है इसकी जानकारी भूमाफियाओं तक लगातार आ रही है। यही वजह है कि मास्टर प्लान की जमीनों पर धारा 16 के तहत धड़ल्ले से नक्शे कैसे पास होते जा रहे हैं? इन नक्शों को पास करवाने की सुपारी भी टीएनसीपी के डिप्टी डायरेक्टर केएस गवली ने ले रखी है। गवली को पूरा भरोसा है कि कुछ नेताओं और अफसरों को रहते उनका कुछ नहीं बिगड़ने वाला चाहे सरकार किसी की भी आ जाए। यही वजह है कि वे 2012 से वे इसी कुर्सी पर विराजमान हैं। हां, एक-दो बार कुछ समय के लिए वे दूसरे शहर में प्रवास पर जरूर चले गए थे, लेकिन चहेतों ने तुरंत इंदौर का टिकट कटवा दिया।

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