इंदौर। शासन-प्रशासन भूमाफियाओं से पीड़ित लोगों की मदद के लिए हर बार वादे करता है, कई अभियान भी चलाया जाता है लेकिन सब बेकार ही साबित होते हैं। हर बार भूमाफिया सब पर भारी पड़ते हैं और अपनी जादूगर से सबको अपने सामने घुटने टेकने पर मजबूर कर देते हैं। अयोध्यापुरी के मामले में एक बार फिर यही साबित हुआ है।
सिम्पलेक्स विवाद में दस्तावेज तक नहीं पेश हुआ
खजराना क्षेत्र की 6.28 हेक्टेयर जमीन को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद में जिला न्यायालय ने अयोध्यापुरी रहवासी कल्याण समिति को बड़ा झटका दिया है। 23वें जिला न्यायाधीश डॉ. (श्रीमती) शुभ्रा सिंह की अदालत ने सिम्पलेक्स इन्वेस्टमेंट एंड मेगा फाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ समिति की ओर से दायर प्रतिदावे को खारिज कर दिया। अदालत ने पाया कि समिति विवादित जमीन पर अपना स्वामित्व और आधिपत्य प्रमाणित करने के लिए आवश्यक दस्तावेज पेश नहीं कर सकी। 8 अक्टूबर 2026 को घोषित फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल भूखंड आवंटन की सूची के आधार पर जमीन का स्वामित्व साबित नहीं होता। इसके लिए विधिवत विक्रय पत्र जैसे दस्तावेज जरूरी हैं।
👉 यह भी पढ़ें:
- विधायक गोलू शुक्ला के पंडितजी से अभद्रता पड़ी भारी, एरोड्रम थाने के टीआई सहित सात पुलिसकर्मी सस्पेंड
- यशवंत क्लब में निर्माण टेंडर पर विवाद : जो सदस्य हर फैसले में रहे साथ, वही अब उठा रहे आपत्ति
- योजना 171 और 77 के प्लॉट धारकों के बहाने भूमाफियाओं को फायदा पहुंचाने की तैयारी!
- धारा 53 में छूटी रसूखदारों की करीब 300 करोड़ की जमीन, क्या वापस लेने की लड़ाई लड़ेगा आईडीए?
- कृष्णा संस्था को जमीन आवंटित कर उलझा आईडीए, लोकायुक्त ने भोपाल भेजी फाइल, संभागायुक्त ने भी मंगाए दस्तावेज
- बंटी नागर सुसाइड केस : मौके का फायदा उठाने वाले चला रहे फर्जी कहानी, परिजनों के बयान के बाद ही होगा कोई खुलासा
2007 में हुआ था चार करोड़ रुपये का सौदा
विवाद ग्राम खजराना स्थित कुल 6.28 हेक्टेयर यानी लगभग 15.52 एकड़ जमीन से जुड़ा है। यह जमीन देवी अहिल्या श्रमिक कामगार सहकारी संस्था मर्यादित से संबंधित थी। कंपनी ने दावा किया था कि संस्था ने 24 फरवरी 2007 को पंजीकृत विक्रय पत्र के माध्यम से विवादित जमीन का करीब चार एकड़ हिस्सा उसे बेचा था। कंपनी ने राजस्व रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज कराए जाने के आधार पर जमीन पर अधिकार जताया था। दूसरी ओर, अयोध्यापुरी रहवासी कल्याण समिति का कहना था कि सहकारी संस्था ने पहले ही अपने सदस्यों को भूखंड आवंटित कर दिए थे। समिति के मुताबिक, इन भूखंडों पर विकास कार्य भी किया गया था और बाद में कंपनी के पक्ष में किया गया विक्रय उसके सदस्यों के हितों के विरुद्ध था।
कोर्ट में जवाब ही नहीं प्रस्तुत कर पाए अधिकारी
अयोध्यापुरी रहवासी कल्याण संघ ने इस जमीन पर अपने सदस्यों की रजिस्ट्री होने का दावा करते हुए कंपनी के दावे को झूठा बताया था। इसके बाद कंपनी कोर्ट चली गई। इसमें अनुविभागीय अधिकारी (एसडीओ) और कलेक्टर को भी पक्षकार बनाया था। कोर्ट के फैसले के अनुसार एसडीओ और कलेक्टर कोर्ट में जवाब ही प्रस्तुत न कर सके। इसके कारण कोर्ट ने एकपक्षीय फैसला दिया।
पूर्व कलेक्टर ने दर्ज कराई थी एफआईआर
उल्लेखनीय है कि इस जमीन को हासिल करने के लिए अयोध्यापुरी के प्लॉट धारक लगातार लड़ाई लड़ते रहे हैं। कुछ साल पहले चलाए गए ऑपरेशन भूमाफिया अभियान में तत्कालीन कलेक्टर मनीष सिंह ने इस जमीन के मामले एफआईआर भी दर्ज कराई थी।
अयोध्यापुरी में लगातार भूमाफिया सक्रिय
देवी अहिल्या संस्था की कॉलोनी अयोध्यापुरी लगातार विवादों में रही है। यहां जेल रिटर्न भूमाफिया से लेकर अन्य कई भूमाफिया लगातार विवाद खड़ा करते रहे हैं। जब भी प्रशासन ने अयोध्यापुरी के प्लॉट धारकों को न्याय दिलाने की कोशिश की है तब-तब कोई न कोई नया अड़ंगा लगता रहा है। ताज्जुब तो तब होता है कि इसके लिए जिम्मेदार प्रशासन और अन्य विभाग कोर्ट में ढंग से अपना पक्ष भी नहीं रख पाते। इसका मतलब साफ है कि सबकुछ भूमाफियाओं के इशारे पर चल रहा है।
अदालत में भुगतान का मुद्दा भी उठा
मुकदमे के दौरान सहकारी संस्था के रिसीवर की ओर से दिए गए बयान में कहा गया कि चार करोड़ रुपये के सौदे के तहत 20 चेक दिए जाने थे, लेकिन इनमें से नौ चेकों के जरिए 1.80 करोड़ रुपये ही प्राप्त हुए। शेष 2.20 करोड़ रुपये का भुगतान नहीं होने की बात भी रिकॉर्ड पर आई। यह विवादित विक्रय पत्र की वैधता से जुड़ा महत्वपूर्ण पहलू था। हालांकि, कंपनी के मूल वाद की वापसी के बाद अदालत के सामने मुख्य प्रश्न समिति के प्रतिदावे की वैधता और उसे प्रमाणित करने के लिए पेश किए गए साक्ष्य थे।
178 सदस्यों के भूखंडों का स्वामित्व साबित नहीं
समिति ने दावा किया था कि उसके सदस्यों को 1,250 वर्गफीट के भूखंड आवंटित किए गए थे और वे जमीन पर अपने अधिकार रखते हैं। अदालत ने दस्तावेजों की जांच करते हुए पाया कि भूखंड आवंटन की सूची अपने आप में स्वामित्व हस्तांतरित होने का प्रमाण नहीं है। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि रिकॉर्ड पर पेश विक्रय पत्रों में संबंधित भूखंडों के सटीक स्थान और सर्वे नंबरों का स्पष्ट उल्लेख नहीं था। समिति की ओर से ऐसे दस्तावेज भी पेश नहीं किए गए, जिनसे यह साबित हो कि सहकारी संस्था ने विवादित जमीन का स्वामित्व विधिवत समिति या उसके सदस्यों को हस्तांतरित किया था।
कॉलोनी का नियमितीकरण भी नहीं हुआ था
फैसले में अयोध्यापुरी कॉलोनी की वैधता और नियमितीकरण के मुद्दे पर भी चर्चा की गई। अदालत ने रिकॉर्ड के आधार पर कहा कि कॉलोनी को वैध घोषित किए जाने का कोई प्रमाणित दस्तावेज पेश नहीं हुआ। नियमितीकरण के लिए पत्राचार किए जाने के बावजूद प्रक्रिया पूरी होने का प्रमाण नहीं था। अदालत ने यह भी पाया कि भूखंडों पर मकान निर्माण की अनुमति दिए जाने और वास्तविक निर्माण के संबंध में समिति के साक्ष्य पर्याप्त नहीं थे। अदालत के अनुसार, समिति अपने सदस्यों के पक्ष में भूखंडों का विधिवत विक्रय और कब्जा हस्तांतरित होना साबित नहीं कर सकी।
आखिर क्यों मिली कोर्ट में हार
अदालत ने कहा कि जब किसी पक्ष के स्वामित्व और कब्जे दोनों पर विवाद हो, तब केवल निषेधाज्ञा या सीमित घोषणा की राहत पर्याप्त नहीं होती। ऐसी स्थिति में आवश्यकतानुसार स्वामित्व की घोषणा और संबंधित अन्य राहतें भी मांगी जानी चाहिए। समिति ने कंपनी के पक्ष में 24 फरवरी 2007 को निष्पादित विक्रय पत्र को शून्य घोषित करने की राहत मांगी थी, लेकिन अदालत के अनुसार, विवाद की परिस्थितियों में स्थायी निषेधाज्ञा सहित आवश्यक परिणामी राहत की मांग नहीं की गई। इस कारण भी प्रतिदावा पोषणीय नहीं पाया गया। अंततः अदालत ने समिति को प्रतिदावा प्रमाणित करने में असफल मानते हुए उसे खारिज कर दिया।



