इंदौर। अयोध्यापुरी कॉलोनी की जमीन के मामले में कोर्ट में हार के बाद अब कलेक्टर शिवम वर्मा एक्शन में आ गए हैं। हार के कारणों में जिम्मेदार विभागों और अधिकारियों द्वारा कोर्ट में अपना पक्ष सही तरीके से नहीं रख पाना भी पाया गया था अब कलेक्टर शिवम वर्मा ने भी अब इस मामले में संज्ञान लिया है और संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा है।
संबंधित अधिकारियों से मांगा स्पष्टीकरण
उल्लेखनीय है कि ग्राम खजरानी स्थित अयोध्यापुरी भूमि से जुड़े वाद (सिम्पलेक्स इन्वेस्टमेंट एंड मेगा फाइनेंस प्रा.लि. विरुद्ध अनुविभागीय अधिकारी व अन्य) में न्यायालय ने 8 अक्टूबर 2026 को निर्णय पारित किया है। इस संबंध में प्रकाशित समाचारों को गंभीरता से लेते हुए कलेक्टर शिवम वर्मा ने प्रकरण के समस्त अभिलेखों का परीक्षण कराया है। परीक्षण के बाद शासन की ओर से पैरवी की स्थिति के संबंध में वर्तमान तहसीलदार, उप पंजीयक सहकारी संस्थाएं तथा शासकीय अधिवक्ता को नोटिस जारी कर निर्धारित समय-सीमा में लिखित स्पष्टीकरण मांगा गया है।
👉 यह भी पढ़ें:
- आखिर हर बार क्यों ‘जीत’ जाते हैं भूमाफिया, शासन-प्रशासन, कायदे-कानून पर कैसे पड़ जाते हैं भारी?
- भूमाफियाओं के आगे एक बार फिर सब ने टेके घुटने, अयोध्यापुरी की जमीन नहीं बचा सका प्रशासन
- योजना 171 और 77 के प्लॉट धारकों के बहाने भूमाफियाओं को फायदा पहुंचाने की तैयारी!
- धारा 53 में छूटी रसूखदारों की करीब 300 करोड़ की जमीन, क्या वापस लेने की लड़ाई लड़ेगा आईडीए?
- कृष्णा संस्था को जमीन आवंटित कर उलझा आईडीए, लोकायुक्त ने भोपाल भेजी फाइल, संभागायुक्त ने भी मंगाए दस्तावेज
- बंटी नागर सुसाइड केस : मौके का फायदा उठाने वाले चला रहे फर्जी कहानी, परिजनों के बयान के बाद ही होगा कोई खुलासा
भूमाफियाओं को लेकर सख्त हुए कलेक्टर
उल्लेखनीय है कि कलेक्टर शिवम वर्मा भूमाफियाओं को लेकर लगातार सख्त दिखा रहे हैं। पिछे दिनों उनके आदेश पर कई भूमाफियाओं के खिलाफ कार्रवाई हुई थी। कई अवैध निर्माण भी ध्वस्त किए गए थे। कलेक्टर ने अयोध्यापुरी मामले को भी गंभीरता से लिया है और इस प्रकरण से जुड़े भूमाफिया भी उनके निशाने पर हैं।
दस्तावेज पेश नहीं कर पाए थे अधिकारी
खजराना क्षेत्र की 6.28 हेक्टेयर जमीन को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद में जिला न्यायालय ने अयोध्यापुरी रहवासी कल्याण समिति को बड़ा झटका दिया है। 23वें जिला न्यायाधीश डॉ. (श्रीमती) शुभ्रा सिंह की अदालत ने सिम्पलेक्स इन्वेस्टमेंट एंड मेगा फाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ समिति की ओर से दायर प्रतिदावे को खारिज कर दिया। अदालत ने पाया कि समिति विवादित जमीन पर अपना स्वामित्व और आधिपत्य प्रमाणित करने के लिए आवश्यक दस्तावेज पेश नहीं कर सकी। 8 अक्टूबर 2026 को घोषित फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल भूखंड आवंटन की सूची के आधार पर जमीन का स्वामित्व साबित नहीं होता। इसके लिए विधिवत विक्रय पत्र जैसे दस्तावेज जरूरी हैं।
2007 में हुआ था चार करोड़ रुपये का सौदा
विवाद ग्राम खजराना स्थित कुल 6.28 हेक्टेयर यानी लगभग 15.52 एकड़ जमीन से जुड़ा है। यह जमीन देवी अहिल्या श्रमिक कामगार सहकारी संस्था मर्यादित से संबंधित थी। कंपनी ने दावा किया था कि संस्था ने 24 फरवरी 2007 को पंजीकृत विक्रय पत्र के माध्यम से विवादित जमीन का करीब चार एकड़ हिस्सा उसे बेचा था। कंपनी ने राजस्व रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज कराए जाने के आधार पर जमीन पर अधिकार जताया था। दूसरी ओर, अयोध्यापुरी रहवासी कल्याण समिति का कहना था कि सहकारी संस्था ने पहले ही अपने सदस्यों को भूखंड आवंटित कर दिए थे। समिति के मुताबिक, इन भूखंडों पर विकास कार्य भी किया गया था और बाद में कंपनी के पक्ष में किया गया विक्रय उसके सदस्यों के हितों के विरुद्ध था।
मामले में एसडीओ थे पक्षकार
अयोध्यापुरी रहवासी कल्याण संघ ने इस जमीन पर अपने सदस्यों की रजिस्ट्री होने का दावा करते हुए कंपनी के दावे को झूठा बताया था। इसके बाद कंपनी कोर्ट चली गई। इसमें अनुविभागीय अधिकारी (एसडीओ) और कलेक्टर को भी पक्षकार बनाया था। कोर्ट के फैसले के अनुसार एसडीओ और कलेक्टर कोर्ट में जवाब ही प्रस्तुत न कर सके। इसके कारण कोर्ट ने एकपक्षीय फैसला दिया।
पूर्व कलेक्टर ने दर्ज कराई थी एफआईआर
उल्लेखनीय है कि इस जमीन को हासिल करने के लिए अयोध्यापुरी के प्लॉट धारक लगातार लड़ाई लड़ते रहे हैं। कुछ साल पहले चलाए गए ऑपरेशन भूमाफिया अभियान में तत्कालीन कलेक्टर मनीष सिंह ने इस जमीन के मामले एफआईआर भी दर्ज कराई थी।
अयोध्यापुरी में लगातार भूमाफिया सक्रिय
देवी अहिल्या संस्था की कॉलोनी अयोध्यापुरी लगातार विवादों में रही है। यहां जेल रिटर्न भूमाफिया से लेकर अन्य कई भूमाफिया लगातार विवाद खड़ा करते रहे हैं। जब भी प्रशासन ने अयोध्यापुरी के प्लॉट धारकों को न्याय दिलाने की कोशिश की है तब-तब कोई न कोई नया अड़ंगा लगता रहा है। ताज्जुब तो तब होता है कि इसके लिए जिम्मेदार प्रशासन और अन्य विभाग कोर्ट में ढंग से अपना पक्ष भी नहीं रख पाते। इसका मतलब साफ है कि सबकुछ भूमाफियाओं के इशारे पर चल रहा है।



