इस्तीफा नहीं दूंगी: धरना क्वीन ममता बनर्जी की यह नौटंकी क्यों?

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शिखर चंद जैन

(कोलकाता के स्वतंत्र पत्रकार और लेखक)

ममता बनर्जी स्वयं को कानून का जानकार कहती हैं, वे सुप्रीम कोर्ट में भी एस आई आर के खिलाफ पैरवी करने गई थीं, लेकिन क्या हुआ? उन्हें फटकार मिली।

अब वे कहती हैं इस्तीफा नहीं दूंगी। क्या ममता दीदी ‘नबान्न’ में टीएमसी के गुंडों के माध्यम से घुसेंगी? त्यागपत्र देने से ऐसे मना कर रही हैं, जैसे कि उनका मना करना प्रशासन, राज्यपाल और भाजपा  मान लेगी और उन्हें फूलों का गुलदस्ता देकर कहेगी, ” कोई बात नहीं, दीदी, आप संभालिए। ” क्या वे नहीं जानती कि त्यागपत्र न देने पर उन्हें बर्खास्त करके निकाला जाएगा?

आइए अब जानते हैं, इस नाटक की मूल वजह। असल में ममता बनर्जी जीत जातीं तो सदन में लीडर ऑफ ऑपोजिशन होती । इस भूमिका से वे अपने विधायक दल को बांधे रखती ।

जैसे वामपंथी सरकार की नाक में दम किया था, वैसे ही बंगाल की भाजपा सरकार को दिन रात घेरती रहतीं , धरना देतीं।। सड़क से सदन तक विरोध करतीं ।लेकिन मोदी शाह इतने भोले नहीं हैं, वे दूरदर्शी हैं।कश्मीर से धारा 370 ऐसे ही खत्म थोड़े कर दी।

टीम नरेंद्र मोदी ने ममता को चुनावी जमीन पर ही खत्म करने की रणनीति पर काम किया । ममता  किसी भी सूरत में न जीत सके उसके लिए एक एक वोटर को साधने की  योजना बनाई।गुजराती , राजस्थानी, बिहारी, यूपी वाले सारे नेता लगा दिए। भजन लाल शर्मा आए, योगी आदित्यनाथ जी आए, हिमांता सरमा आए, मैथिली ठाकुर आईं, कंगना राणावत आईं। बाहर से आए सारे कार्यकर्ता लगा दिए, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जमीनी स्तर पर जुट गया।

नतीजे सामने है। अब ममता सदन में नहीं  घुस सकेंगी। सदन में मुद्दों पर भिड़ भी नहीं सकती। इस बुढ़ापे में और चिड़चिड़े मिजाज के साथ सड़क पर आंदोलन भी नहीं कर सकती। इस तरह उनकी जुझारू राजनीति का पूर्ण विराम हो गया है।

आखिरकार यह हुआ कैसे?

चालीस डिग्री से भी ज्यादा तापमान वाली भीषण गर्मी और लू के थपेड़ों के बावजूद पश्चिम बंगाल के वोटर बड़ी संख्या में घरों से बाहर निकले. वे जानते थे कि हर वोट मायने रखता है. और अब, बंगाल ने राहत की सांस ली है।

याद कीजिए वो वामपंथी जमाना और ममता बनर्जी का अफसाना।

जब ममता बनर्जी ने सत्ता में जोरदार दस्तक दी थी-और माकपा के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार के 34 साल के शासन को उखाड़ फेंका था तब बंगाल के समाज के हर तबके के लोगों ने राहत की सांस ली थी. लेकिन समय के साथ ममता भूल गईं कि लोगों ने तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी को एक ऐसी साफ-सुथरी सरकार चलाने का जनादेश दिया था, जो भ्रष्टाचार, गुंडागर्दी और ‘सिंडिकेट राज’ से मुक्त हो. एक ऐसा जनादेश, जिसके जरिये विकास, औद्योगीकरण, रोजगार के अवसर, शिक्षा और तेजी से बिगड़ती कानून-व्यवस्था को फिर से बहाल किया जा सके. पर उस सत्ता की चाशनी ऐसी मुंह लगी कि समय के साथ भ्रष्टाचार उनकी सरकार की पहचान बन गया।

विकास की शुरुआती उम्मीदें उनकी महत्वाकांक्षी और लोगों को लालच देने, अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण करने,उद्योपतियों का दोहन करने की अघोषित मगर स्पष्ट दिखने वाली नीतियों की भेंट चढ़ गयीं, उद्योगों के बंद होने का सिलसिला और तेज हो गया। बड़ी संख्या में कंपनियां राज्य छोड़कर चली गयीं. रोजगार के अवसरों की जगह और ज्यादा बेरोजगारी ने ले ली, हजारों स्कूल या तो पूरी तरह बंद हो गये या फिर नाम मात्र के शिक्षकों और कर्मचारियों के सहारे किसी तरह घिसटते रहे।  सैकड़ों शिक्षकों के पद खाली पड़े थे और कानून-व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गयी, जबकि गुंडे और बलात्कारी पूरे राज्य में बेखौफ घूमते रहे।

क्या आपको याद है कि वर्ष 2016 में उनके सत्ता में दोबारा लौटने के तुरंत बाद एक छोटी, लेकिन महत्वपूर्ण घटना घटी थी। 2017 में स्कूलों की पाठ्य पुस्तकों में पश्चिम बंगाल में ‘रामधनु’ (बांग्ला में इंद्रधनुष के लिए प्रयुक्त शब्द) का नाम बदलकर ‘रंगधनु’ कर दिया गया था. पाठ्यक्रम में इस बदलाव ने एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया. पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने 2017 में कक्षा सात की ‘पर्यावरण और विज्ञान’ की पाठ्यपुस्तक में ‘रंगधनु’ को शामिल किया, ताकि एक तथाकथित ‘धर्मनिरपेक्ष’ स्वर को बढ़ावा दिया जा सके.

ममता बनर्जी की मुस्लिम तुष्टिकरण की रणनीति बांग्लादेश से आने वाले अवैध मुस्लिम घुसपैठियों के प्रवेश को आसान बनाना था. केंद्रीय गृह मंत्रालय के बार-बार अनुरोधों के बावजूद अगस्त, 2025 तक 2,216.7 किलोमीटर लंबी पश्चिम बंगाल-बांग्लादेश सीमा का लगभग 569.004 किलोमीटर हिस्सा बिना बाड़ के ही बना रहा.

कामदुनी, संदेशखाली, मालदा ,मुर्शिदाबाद के कलंक की गूंज पूरे भारत में ही नहीं विश्व भर में खबर बनी, लेकिन पश्चिम बंगाल सरकार और यहां के ज्यादातर अखबारों ने ऐसे दिखावा किया, मानो कुछ हुआ ही न हो। हिंदुओं के घर फूंक दिए गए, बहू बेटियों के बलात्कार हुए, हत्याएं हुईं, मंदिरों को बंद करवा दिया गया।बहुसंख्यक तड़प रहे थे कि कोई उनकी आवाज सुने। मगर पुलिस, पार्षद, विधायक, सांसद और यहां तक कि मुख्यमंत्री ने भी पीड़ितों की तरफ से मुंह फेर लिया।

नौ अगस्त, 2024 को कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में 31 साल की एक पोस्टग्रेजुएट ट्रेनी डॉक्टर के साथ हुई बेरहम यौन हिंसा और हत्या ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया. इसके चलते सीबीआई जांच शुरू हुई और मात्र एक सिविक वॉलंटियर संजय रॉय को दोषी ठहराया गया. मानो इतना बड़ा षड्यंत्र उसने अकेले ने ही किया हो। वहां के एक टीएमसी नेता का नाम बार बार उछाला गया, मगर उसका बाल तक बांका नहीं हुआ।

आर जी कर मामले का पश्चिम बंगाल में गहरा राजनीतिक और सामाजिक असर पड़ा. इसकी वजह से महिलाओं के वोटों का एक बड़ा हिस्सा तृणमूल से हटकर भाजपा की तरफ चला गया।

इस्तीफा नहीं दूंगी: धरना क्वीन ममता बनर्जी की यह नौटंकी क्यों?

शिखर चंद जैन

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