श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर के सीएम उमर अब्दुल्ला ने शनिवार को भाजपा पर नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) के विधायकों को तोड़ने का आरोप लगाया। पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उमर ने दावा किया कि जम्मू से पार्टी के एक विधायक को पाला बदलने के लिए 20-30 करोड़ रुपये और मंत्री पद का ऑफर दिया गया था।
उमर अब्दुल्ला ने कहा कि वे एक बार फिर नेशनल कॉन्फ्रेंस को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। मुझे बताया गया है कि जम्मू से हमारे एक विधायक को 20-30 करोड़ रुपये, मंत्री पद और राज्य का दर्जा बहाल करने का वादा किया गया था, अगर वह उनके साथ शामिल हो जाएं। उन्हें लगता है कि लोगों की अंतरात्मा इतनी सस्ती है।
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20 जुलाई को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन
सीएम अब्दुल्ला ने कहा कि नेशनल कॉन्फ्रेंस ने टकराव के बजाय बातचीत के जरिए जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल कराने की कोशिश में लगभग दो साल बिताए हैं। उन्होंने कहा कि मैंने सोच-समझकर केंद्र को अपने वादे पूरे करने का समय दिया, लेकिन आज हम विरोध की बात करने के लिए मजबूर हैं क्योंकि साफ तौर पर कुछ बदल गया है। उमर ने घोषणा की कि नेशनल कॉन्फ्रेंस 20 जुलाई को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर बड़ा विरोध प्रदर्शन करेगी और शांतिपूर्ण तरीके से राज्य का दर्जा बहाल करने की अपनी मांग को तेज करेगी।
पिछले दरवाजे से घुसने की कोशिश
उमर अब्दुल्ला ने केंद्र सरकार को चुनौती देते हुए कहा कि भाजपा ने दलबदल के जरिए सरकार में पिछले दरवाजे से घुसने की कई कोशिशें की है। उन्होंने कहा कि अगर आपका यही रुख है, तो सार्वजनिक रूप से यह कहने की हिम्मत दिखाएं कि जब तक आपकी पार्टी यहां सरकार नहीं बना लेती, तब तक राज्य का दर्जा बहाल नहीं किया जाएगा।
राज्य का दर्जा देने का मामला क्यों अटका
अनुच्छेद 370 की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में केंद्र द्वारा दिए गए बयानों को याद करते हुए उमर अब्दुल्ला ने कहा कि सरकार ने तीन चरणों का रोडमैप बताया था – परिसीमन, विधानसभा चुनाव और राज्य का दर्जा बहाल करना। उन्होंने कहा कि परिसीमन पूरा हो गया है, चुनाव हो चुके हैं और लोगों ने हमें जनादेश दिया है। अब हमारी क्या गलती है? राज्य का दर्जा बहाल करने का वादा अभी भी क्यों लटका हुआ है?
हर फैसला राजभवन से होता है
चुनी हुई सरकार के कामकाज और उपराज्यपाल शासन पर सवाल उठाते हुए उमर ने कहा कि अगर अहम फैसले राजभवन से ही लिए जाते रहे, तो चुनाव कराने का कोई खास मकसद नहीं रह जाता। उन्होंने कहा कि अगर सब कुछ राजभवन से ही चलाना है, अगर कर्मचारियों को नौकरी से निकालना है और सारे बड़े फैसले वहीं लेने हैं, तो चुनाव क्यों कराए गए? हमें सरकार में क्यों लाया गया, जबकि हमारे हाथ पीछे बंधे हुए थे?
हमारे सब्र को कमजोरी न समझें
सीएम अब्दुल्ला ने कहा कि उन्होंने शेर-ए-कश्मीर शेख मोहम्मद अब्दुल्ला को जेल जाते देखा और 1984 में नेशनल कॉन्फ्रेंस को बंटते देखा, फिर भी कभी सब्र का रास्ता नहीं छोड़ा। उन्होंने कहा कि शेख साहब ने हमें सबसे बड़ा सबक यह सिखाया कि सब्र कमजोरी नहीं है। इसका मतलब यह नहीं है कि हम अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाना बंद कर देंगे।



