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नई दिल्ली। दिल्ली विधानसभा के लिए चुनाव मैदान में सभी दल पूरी ताकत से जुट गए हैं। भाजपा जहां दिल्ली की गद्दी हथियाने के लिए हर कोशिश कर रही है, वहीं आम आदमी पार्टी फिर से सत्ता पाने के लिए सारे हथकंडे अपना रही है। इन सबके बीच यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ और एआईएमआईएम के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की एंट्री से चुनावी माहौल बदल रहा है। क्या ये दोनों धार्मिक रूप से वोटों का ध्रुवीकरण कर पाएंगे।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दिल्ली के करोल बाग से अपने चुनाव प्रचार की शुरुआत की। योगी के बंटेंगे तो कटेंगे नारे ने महाराष्ट्र में भी चुनावी माहौल बदल दिया था। योगी ने अपने भाषण में अरविंद केजरीवाल को निशाने पर लिया और हिंदू वोट बैंक को साधने की पूरी कोशिश की। योगी ने अपने भाषण में कहा कि दिल्ली को धर्म के आधार पर बांटने वालों से सावधान रहना होगा।हमारी सरकार सबका साथ, सबका विकास की नीति पर चलती है। योगी के भाषण से साफ जाहिर है कि इस चुनाव में भी हिन्दुत्व का मुद्दा हावी रहेगा।
मुसलमानों की हक की बात कह रहे ओवैसी
एआईएमआईएम के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी दिल्ली में अपनी रैली की। दिल्ली में लगे पोस्टर ओवैसी के एजेंडे को स्पष्ट कर रहे हैं। एक पोस्टर में आरोपी शिफा–उर–रहमान को निर्दोष बताया गया, जिसमें लिखा था कि निर्दोष का साथ निभाना है, हकदार को हक दिलाना है। ओवैसी ने अपने भाषण में कहा कि दिल्ली के मुसलमानों को उनके अधिकार दिलाने के लिए हमारी पार्टी मैदान में है। धर्म के आधार पर बांटने की साजिशों को नाकाम करना होगा।
मुस्लिम वोट पाने में जुटे तीन दल
दिल्ली में मुस्लिम वोटबैंक की काफी महत्वपूर्ण भूमिका है। दिल्ली की करीब 13% आबादी मुस्लिम है, जो 9 विधानसभा सीटों पर निर्णायक मानी जाती है। पिछले चुनावों में यह वोट आम आदमी के पक्ष में जाते दिखे, लेकिन इस बार कांग्रेस और ओवैसी भी इसे अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहे हैं। ओवैसी ने मुस्लिम सेंटिमेंट्स को भुनाने के लिए दंगों के आरोपियों को टिकट दिया और अब उनके लिए वोट मांग रहे हैं। वहीं, कांग्रेस ने राहुल गांधी की रैलियों के जरिए इस वोटबैंक को साधने की रणनीति अपनाई है। मुस्लिम वोट पर दावा करने वाले आप, कांग्रेस और एआईएमआईएम के बीच खींचतान ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या इस बार मुसलमानों के वोट बंटेंगे? अगर ऐसा होता है, तो इसका सीधा फायदा भाजपा को मिल सकता है।



