महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर जुबानी जंग तेज हो गई है। शिवसेना (यूबीटी) और एकनाथ शिंदे गुट के बीच चल रहा सत्ता और विरासत का संघर्ष अब और अधिक तीखा होता नजर आ रहा है। मुंबई में शिवसेना के 60वें स्थापना दिवस समारोह के बाद दोनों गुटों के नेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर लगातार जारी है।
शिवसेना (यूबीटी) के वरिष्ठ नेता और सांसद संजय राउत ने एकनाथ शिंदे गुट पर जोरदार हमला बोला। राउत ने व्यंग्य करते हुए कहा कि यह किसी “जैविक चमत्कार” से कम नहीं है कि केवल चार साल पहले बने संगठन को 60 साल पुरानी पार्टी का दर्जा देने की कोशिश की जा रही है।
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राउत ने शिंदे गुट को निशाने पर लेते हुए कहा कि असली शिवसेना आज भी उद्धव बालासाहेब ठाकरे के नेतृत्व में है, जबकि शिंदे का संगठन “टेस्ट ट्यूब बेबी” की तरह है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि चार साल पुराने संगठन को 60 साल पुराना बताना राजनीतिक इतिहास का सबसे बड़ा विरोधाभास है।
यही नहीं, राउत ने पार्टी छोड़ने वाले नेताओं और सांसदों पर भी तीखा हमला बोला। उन्होंने दावा किया कि कुछ नेताओं को “नीलामी में खरीदा गया” है। राउत ने कहा कि असली “बाघ” अभी भी उद्धव ठाकरे के साथ हैं, जबकि जो लोग पार्टी छोड़कर गए, वे खुद को बेचने के लिए बाजार में चले गए।
उन्होंने कहा, “यह ऑपरेशन टाइगर नहीं है। जो लोग गए हैं वे बाघ नहीं, बल्कि लोमड़ियां हैं। बाघों की सेना आज भी हमारे साथ खड़ी है।”
राजनीतिक माहौल को और गर्माते हुए संजय राउत ने सोशल मीडिया पर एक रहस्यमयी पोस्ट भी साझा की। पोस्ट में लिखा था, “कुछ लोग कुत्ते तो होते हैं, लेकिन वफादार नहीं होते।” इस पोस्ट को लेकर राजनीतिक गलियारों में कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं।

दूसरी ओर, महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने पलटवार करते हुए उद्धव ठाकरे पर गंभीर आरोप लगाए। शिंदे ने कहा कि सत्ता के लिए उद्धव ठाकरे ने शिवसेना संस्थापक बालासाहेब ठाकरे के मूल सिद्धांतों और विचारधारा से समझौता किया, जिसके कारण कई नेता पार्टी छोड़ने को मजबूर हुए।
अब सवाल सिर्फ पार्टी के नाम या चुनाव चिह्न का नहीं, बल्कि शिवसेना की असली विरासत और राजनीतिक पहचान का बन गया है। जैसे-जैसे महाराष्ट्र की राजनीति नए समीकरणों की ओर बढ़ रही है, दोनों गुटों के बीच यह टकराव और तेज होने के संकेत मिल रहे हैं।
आपकी नजर में असली शिवसेना किसकी है—उद्धव ठाकरे की या एकनाथ शिंदे की? क्या नेताओं का दल-बदल विचारधारा का सवाल है या सत्ता की राजनीति? कमेंट कर अपनी राय जरूर बताएं।



