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लंबे समय से नगर निगम में समन्वय का अभाव दिख रहा है। वर्तमान में निगम की हालत ऐसी है कि उसके एक हाथ को पता ही नहीं चलता कि दूसरा हाथ क्या कर रहा है? विडंबना यह कि नगर निगम के रथ के दो घोड़े यानी निगमायुक्त दिलीप कुमार यादव और महापौर पुष्यमित्र भार्गव अलग-अलग दिशा में चलते दिखाई दे रहे हैं।
सड़कों के पेचवर्क जैसे छोटे काम के लिए ही महापौर को कितनी मेहनत करनी पड़ रही है। सीएस तक को चिट्ठी लिखनी पड़ गई। महापौर विधायकों के साथ बैठक कर मामले को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन बेचारे विधायक भी नहीं समझ पा रहे कि माजरा क्या है? कई विधायक तो महापौर से ही परेशान हैं। इतनी ताकत लगाने के बाद अब सड़कों के गड्ढे भरने शुरू हुए हैं, जब सारे प्रमुख त्योहार बीत चुके। आखिर ऐसी नौबत आई ही क्यों? क्या पहले नगर निगम में काम नहीं होता था?
शहर के लोगों से अपने महापौर का दुख नहीं देखा जाता। वे भी क्या करें, सारे निगमायुक्त ही उटपटांग आ रहे हैं। इसीलिए तो उनकी किसी से बनी नहीं। बेचारे शिकायत कर-कर के थक जाते हैं। इसके पहले वाले निगमायुक्त की महापौर ने इतनी शिकायत कर दी कि सीएम ने उन्हें इंदौर का कलेक्टर बना दिया।
अब नए निगमायुक्त को पता नहीं भोपाल से कौन सा मंत्र फूंक कर भेजा गया था। आते के साथ पहले पूर्व महापौर और वर्तमान में विधानसभा चार की विधायक मालिनी गौड़ से पंगा ले लिया। बात सीएम तक पहुंची। इसके बाद मन नहीं भरा तो मधु वर्मा से पंगा ले लिया। इस पंगे के रिएक्शन में ही निगम के बीआरओ पर केस दर्ज हुआ और रातभर भंवरकुआं थाने में ड्रामा चलता रहा। अब सुनने में आ रहा है कि नए निगमायुक्त इंदौर में ही किसी और से निर्देश लेने लगे हैं। एक ऐसे नेता से जो नगर निगम के कामकाज में रायता ढोलने के एक्सपर्ट हैं।
अब मान भी जाओ। आप दोनों के आपसी झगड़े में इंदौर और यहां की जनता सैंडविच बन रही है। अगर दोनों अपनी-अपनी दिशा में नगर निगम के रथ को खींचते रहे तो बेचारे विकास का क्या होगा?



