कैबिनेट बैठकों से मंत्री विजयवर्गीय के गायब रहने पर उठ रहे सवाल, नागपुर के बहाने कहीं और तो नहीं साध रहे निशाना

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इंदौर। महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं। इस दौरान प्रदेश के कई मंत्री व नेताओं को वहां जिम्मेदारी दी गई है। प्रदेश के काबिना मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को भी नागपुर के आसपास के कुछ सीटों की जिम्मेदारी दी गई है। इस बहाने वे प्रदेश कैबिनेट की बैठकों से लगातार गायब हैं, लेकिन विपक्ष सहित सत्तापक्ष के मन में भी इस पर सवाल खड़े हो गए हैं। भाजपा के नेता ही कह रहे हैं कि विजयवर्गीय कहीं नागपुर के बहाने कहीं और तो निशाना नहीं साध रहे।

मंगलवार को हुई कैबिनेट बैठक से भी मंत्री विजयवर्गीय गायब रहे। बताया जा रहा है कि यह लगातार चौथी ऐसी बैठक है जिसमें उनकी अनुपस्थिति रही है। कांग्रेस मीडिया विभाग के अध्यक्ष मुकेश नायक ने सरकार में विजयवर्गीय की उपेक्षा का आरोप लगाया है। कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता भूपेन्द्र गुप्ता ने कहा है कि सरकार में कैलाश विजयवर्गीय सबसे वरिष्ठ हैं और लगातार उनका बैठक में मौजूद होना कई सवाल खड़े करता है। सरकार में उनकी उपेक्षा हो रही है। लगता है इसलिए उन्होंने कैबिनेट से ही दूरी बना ली है।

मध्यप्रदेश भाजपा में यूपी जैसी हालत

इधर, कांग्रेस के एक और प्रदेश प्रवक्ता अब्बास हफीज कहते हैं कि प्रदेश भाजपा में जमकर अंतरकलह है। कई वरिष्ठ नेता मोहन यादव को मुख्यमंत्री के रूप में पचा नहीं पा रहे हैं। मध्य प्रदेश में भी उत्तर प्रदेश भाजपा जैसे हालात हो गए हैं। कैलाश विजयवर्गीय जैसे सीनियर नेता मध्य प्रदेश में केशव प्रसाद मौर्य के रास्ते पर चलते दिखाई दे रहे हैं।

नागपुर में खुद का संपर्क अभियान

भाजपा के ही कुछ नेता कह रहे हैं कि महाराष्ट्र चुनाव के बहाने कैलाश विजयवर्गीय को संघ और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं से संपर्क बनाने का मौका मिल गया है। इसका उन्होंने भरपूर फायदा उठाया। कुछ नेता तो दबी जुबान से यह भी कह रहे हैं कि विजयवर्गीय को लग गया है कि अब सीएम की कुर्सी तो हाथ आने से रही। लंबे समय से उन्हें इस कुर्सी का इंतजार है। और यही वजह है कि उमा भारती के बाद न तो बाबूलाल गौर से उनकी बनी और शिवराज सिंह चौहान के साथ उनकी केमेस्ट्री के बारे में तो सबको पता है। सूत्र बताते हैं कि विजयवर्गीय की कोशिश है कि किसी भी तरह से प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर कब्जा जमा लिया जाए।

मोहन यादव के आगे एक न चल रही

जब से मोहन यादव ने सीएम की कुर्सी संभाली है, उनके कामकाज का अपना ही अलग ही अंदाज है। वे किसी भी वरिष्ठ-गरिष्ठ का राजनीतिक दबाव नहीं झेल रहे। चूंकि शीर्ष नेतृत्व ने उन्हें सत्ता सौंपी है और हरियाणा चुनाव से लेकर अन्य चुनावों में उनकी सफलता देख आलाकमान भी खुश हैं, इसलिए उन पर ऊपर से भी दबाव बनवा पाना संभव नहीं। विजयवर्गीय को दबाव बनाकर काम करने की आदत है, लेकिन सीएम मोहन यादव के सामने वे इसमें सफल नहीं हो पा रहे। सीएम यादव ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रदेश के विकास की गाड़ी के सिर्फ वे ही ड्राइवर हैं और इसकी रफ्तार को किसी भी हालत में कम नहीं होने देंगे। यही वजह है कि इंदौर में जब राजनीति उठापटक शुरू हो गई थी और विकास की रफ्तार कम होने लगी तो सीएम ने खुद यहां का प्रभार संभाल लिया।

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