सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ता नजर आ रहा है। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने कहा है कि सिंधु जल संधि के निलंबन के बाद भारत को अपनी नदियों के पानी का बेहतर इस्तेमाल करने का अधिकार मिलना चाहिए।
उमर अब्दुल्लाह ने कहा, “ये हमारी नदियां हैं और इन पर पहला हक हमारा बनता था।” उन्होंने दावा किया कि पंजाब की छह प्रमुख नदियों में से तीन भारत के हिस्से में आईं, जबकि तीन पाकिस्तान को मिलीं। उनके मुताबिक, जम्मू-कश्मीर लंबे समय से इस व्यवस्था का नुकसान झेलता रहा है।
👉 यह भी पढ़ें:
- सिंधु जल संधि पर शहबाज शरीफ की भारत को गीदड़ भभकी , बोले—पानी की एक-एक बूंद रेड लाइन
- Omar Abdullah : पत्नी पायल से तलाक लेने सुप्रीम कोर्ट पहुंचे जम्मू-कश्मीर के सीएम, दोनों के बीच बनी सहमति
- पेपर लीक पर उमर अब्दुल्ला का जेपी नड्डा को जवाब—‘मामला 2022 का था, तब NC-कांग्रेस की सरकार नहीं थी’
- Jammu-Kashmir में विधायकों के तोड़ने के आरोपों पर भड़की भाजपा, उमर अब्दुल्ला को भेजा 100 करोड़ के मानहानि का नोटिस
- Jammu-Kashmir : पूर्ण राज्य के दर्जे पर बोले उमर अब्दुल्ला-क्या ट्रंप साहब से लगाऊं गुहार
- Jammu-Kashmir में भी ऑपरेशन लोटस, सीएम उमर अब्दुल्ला ने भाजपा पर लगाया विधायकों को 20-30 करोड़ के ऑफर देने का आरोप
उन्होंने कहा कि सिंधु जल संधि का निलंबन जारी रहना चाहिए, ताकि भारत और खासकर जम्मू-कश्मीर अपने जल संसाधनों का अधिक प्रभावी तरीके से उपयोग कर सके।

पाकिस्तान की गीदड़ भभकी
इस मुद्दे पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हाल ही में भारत को गीदड़ भभकी दी । उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के पानी की “एक-एक बूंद” उसकी रेडलाइन है और भारत द्वारा अपना रुख नहीं बदलने पर पाकिस्तान जवाब देगा।
दरअसल, अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को निलंबित करने का फैसला किया था। इसके बाद से ही भारत-पाकिस्तान के बीच पानी और जल संसाधनों को लेकर विवाद और तीखा हुआ है।

क्या है सिंधु जल संधि?
सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अय्यूब खान ने कराची में इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।
संधि के तहत रावी, ब्यास और सतलुज के पानी पर भारत का अधिकार है, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब मुख्य रूप से पाकिस्तान के हिस्से में गईं। पश्चिमी नदियों पर भारत को कुछ सीमित उपयोग और जलविद्युत परियोजनाओं की अनुमति भी दी गई थी।
लगभग छह दशकों तक कई युद्धों और तनावों के बावजूद यह संधि दोनों देशों के बीच जल बंटवारे की आधारशिला बनी रही। अब इसके निलंबन ने भारत-पाकिस्तान संबंध, जल सुरक्षा और कूटनीति को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
अब सवाल जनता से
क्या सिंधु जल संधि का निलंबन भारत के हित में है?
क्या जम्मू-कश्मीर को अपनी नदियों के पानी के उपयोग में अधिक अधिकार मिलना चाहिए?
क्या पानी को भारत-पाकिस्तान संबंधों में रणनीतिक मुद्दा बनाया जाना सही है?
आपकी राय क्या है? कमेंट में जरूर बताएं।



