‘वंदे मातरम’ को लेकर देश की सियासत गरमा गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के हमले के बाद कांग्रेस ने बीजेपी पर दिखावटी राष्ट्रवाद और जनता से जुड़े अहम मुद्दों से ध्यान भटकाने का आरोप लगाया है। वहीं बीजेपी ने कांग्रेस के रुख को वोट बैंक और तुष्टीकरण की राजनीति से जोड़कर पलटवार किया है।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में ‘वंदे मातरम’ पर पार्टी का रुख स्पष्ट किया गया। उन्होंने 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा पारित प्रस्ताव का हवाला देते हुए कहा कि पार्टी उसी ऐतिहासिक परंपरा का पालन करती रहेगी।
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रमेश ने यह भी कहा कि 25 जनवरी 1950 को संविधान सभा की अंतिम बैठक में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान और ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किए जाने की घोषणा की थी। कांग्रेस का आरोप है कि बीजेपी इस ऐतिहासिक मुद्दे को राजनीतिक विवाद में बदलकर बेरोजगारी, छात्रों की समस्याओं और सरकार की कथित नाकामियों जैसे मुद्दों से ध्यान हटाना चाहती है।
केरल से यूपी तक सियासी टकराव
केरल में बीजेपी ने आरोप लगाया कि स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम’ को शामिल नहीं किया गया। इसके विरोध में पार्टी ने राज्य के सभी जिला मुख्यालयों पर कार्यक्रम आयोजित करने का ऐलान किया है।

उत्तर प्रदेश में भी विवाद तेज है। बीजेपी नेता और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कांग्रेस पर वोट बैंक की राजनीति का आरोप लगाते हुए सवाल उठाया कि पार्टी गीत के बाकी अंतरे गाने से क्यों पीछे हट रही है।
वहीं अखिलेश यादव और आम आदमी पार्टी नेता संजय सिंह ने बीजेपी और आरएसएस के राष्ट्रवाद के दावों पर सवाल उठाए। दूसरी ओर यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने दावा किया कि कांग्रेस के कार्यक्रमों में लंबे समय से ‘वंदे मातरम’ गाया जाता रहा है।
यानी एक राष्ट्रीय गीत अब राष्ट्रवाद, इतिहास, राजनीति और वोट बैंक की बहस के केंद्र में आ गया है।
आपकी राय क्या है? क्या ‘वंदे मातरम’ जैसे राष्ट्रीय प्रतीक को राजनीतिक विवाद का मुद्दा बनाना सही है? क्या नेताओं को राष्ट्रवाद की बहस के साथ-साथ बेरोजगारी, शिक्षा और युवाओं के मुद्दों पर भी बराबर ध्यान देना चाहिए?
अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं और इस बहस में शामिल हों।



