इंदौर। शहर इन दिनों भयंकर जलसंकट से जूझ रहा है। जनता पानी के लिए त्राहि-त्राहि कर रही है। हालत यह है कि नगर निगम और प्रशासन के लाख दावों के बावजूद बिना पैसे के लोगों को पानी नहीं मिल रहा। पानी के इस व्यापार से नेता से अधिकारी तक जुड़े हुए हैं। ऐसे में इंदौर की जनता कहां जाए?
हर साल होता है पानी का कारोबार
शहर में पानी का कारोबार लंबे समय से चला आ रहा है। टैंकर माफिया हर साल गर्मी का इंतजार करते हैं। इसकी तैयारी दिसंबर-जनवरी से ही शुरू हो जाती है। दूसरे शहरों के भंगार टैंकर खरीदे जाते हैं और उसे रंग-रोगन कर या तो नगर निगम में अटैच कर दिया जाता है या फिर निजी हाइड्रेंट में इस्तेमाल होता है।
👉 यह भी पढ़ें:
- गोलू भिया सावन आ रहा है, लोग कह रहे हैं-भले ही सड़कें जाम कर देना, लेकिन होर्डिंग से शहर को बदरंग मत करना
- प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के भाई नाना से साढ़े तीन घंटे फिर पूछताछ, ड्रग मामले में पुलिस ने बुलाया था
- प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के भाई नाना को पुलिस ने उठाया, ड्रग नेटवर्क में नाम आने के बाद हो रही पूछताछ
- Raja Raghuvanshi Murder Case : सुप्रीम कोर्ट में सोनम ने खुद को निर्दोष बताया, अब 14 जुलाई को होगी सुनवाई
- एक साल से फरार सहकारिता विभाग के सहायक आयुक्त बिलोदिया के प्रमोशन की तैयारी, पदोन्नति अधिनियम का हो रहा खुला उल्लंघन
- डायमंड गृह निर्माण संस्था की जमीन को लेकर अब सहकारिता विभाग की जादूगरी शुरू, सेठिया और कूचनकर जमा रहे सारा खेल
निगम के उपयंत्री के यहां मिला था हाईड्रेंट
पानी के इस कारोबार में नेता से लेकर नगर निगम के अधिकारी और कर्मचारी भी शामिल हैं। कुछ साल पहले जब नगर निगम के एक उपयंत्री के यहां छापा मारा गया था, तो उनके घर पर निजी हाईड्रेंट मिला था। कई टैंकर खड़े मिले थे, जिन पर नगर निगम लिखा हुआ था। ये उपयंत्री लंबे समय तक जलकार्य विभाग से जुड़े थे। कई बार इन्हें वहां से हटाने का नाटक भी हुआ, लेकिन फिर वे जलकार्य विभाग में ही काबिज हो जाते थे। अगर ठीक से जांच की जाए तो ऐसे कई हाईड्रेंट और टैंकर मिल जाएंगे।
नि:शुल्क जल वितरण या मजाक
नगर निगम हर साल टैंकरों से जल वितरण पर नि:शुल्क जल वितरण के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च करता है, लेकिन जनता को नि:शुल्क पानी नहीं मिलता। नगर निगम कंट्रोल रूम पर फोन लगाओ तो कोई जवाब नहीं मिलता। पार्षद को फोन लगाओ तो जवाब मिलता है कि टैंकर अभी नहीं है। विधायक को फोन लगाओ तो नगर निगम पर ठिकरा फोड़ देता है। चारों ओर से थकी जनता आखिर में निगम के टैंकर चालकों को ही पैसे देकर अपनी प्यास बुझाती है।
एक-दूसरे पर ढोल रहे जिम्मेदारी
इस बार तो इंदौर में अजीब ही स्थिति बन गई है। सारे जिम्मेदार एक-दूसरे पर जिम्मेदारी ढोल रहे हैं। विधायक महेंद्र हार्डिया ने अपने क्षेत्र की समस्या उठाई तो महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने पूर्व महापौरों पर जिम्मेदारी डाल दी। निगम के अधिकारियों से बात करो तो वे कर्मचारियों और पार्षदों को दोषी ठहरा देते हैं।
कड़ा एक्शन क्यों नहीं लेते?
इंदौर जैसे शहर में ऐसी स्थिति सिर्फ जिम्मेदारों के रवैये के कारण ही बनी है। छोटी-मोटी कार्रवाई हो रही है। कल ही निगमायुक्त ने पानी बेचते टैंकर पकड़ा था, लेकिन अब इससे कुछ नहीं होने वाला। पानी सिर के ऊपर से जा रहा है। चाहे नगर निगम हो या जिला प्रशासन पानी के मामले में अब सख्त एक्शन की जरूरत है। क्यों नहीं पानी माफियाओं पर कार्रवाई की जा रही? प्राइवेट टैंकर सप्लायर पर सख्ती क्यों नहीं हो रही? नगर निगम के जो टैंकर चालक, जलकार्य विभाग के कर्मचारी पानी से पैसे बना रहे हैं, उन पर लगाम क्यों नहीं कसी जा रही। अब समय आ गया है कि महापौर से लेकर वरिष्ठ अधिकारी तक एक्शन में आ जाएं, सिर्फ बैठकों से कुछ नहीं होने वाला।



