उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने आरक्षण को लेकर चल रही बहस के बीच बीजेपी पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने ‘आरक्षण सुधार’ के नाम पर आरक्षण खत्म करने की साजिश का आरोप लगाते हुए कहा कि “आरक्षण पीडीए का अधिकार है, किसी की इच्छा का विषय नहीं।”
अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि बीजेपी और उसके सहयोगी कभी ‘आरक्षण की समीक्षा’, कभी ‘सुधार’ और कभी ‘क्रीमी लेयर’ जैसे शब्दों के जरिए आरक्षण व्यवस्था पर सवाल उठाते रहे हैं। उनका कहना है कि ये सभी प्रयास सामाजिक रूप से पिछड़े और वंचित वर्गों के अधिकारों को कमजोर करने की कोशिश हैं।
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उन्होंने अपने बयान के अंत में स्पष्ट संदेश दिया—“आरक्षण था, आरक्षण है, आरक्षण रहेगा।”
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से बढ़ी बहस
इसी बीच दिल्ली के जंतर-मंतर पर जाति आधारित आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव और समीक्षा की मांग को लेकर प्रदर्शन हुए हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि सरकारी सहायता और आरक्षण का आधार जाति के बजाय आर्थिक स्थिति होना चाहिए। कुछ प्रदर्शनकारियों ने क्रीमी लेयर और मौजूदा आरक्षण नीति की समीक्षा की मांग भी उठाई है।
इस मुद्दे पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तेज हो गई हैं। वहीं, उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने प्रदर्शनकारियों की मांगों को केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचाने और केंद्रीय मंत्री के साथ बातचीत कराने का आश्वासन दिया है।
आरक्षण भारत में सिर्फ सरकारी नौकरी या शिक्षा में अवसर का मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समान अवसर और ऐतिहासिक वंचना से जुड़ा संवेदनशील विषय है। इसलिए ‘जाति आधारित आरक्षण बनाम आर्थिक आधार पर आरक्षण’ की बहस आने वाले दिनों में और तेज होने की संभावना है।
आपकी राय क्या है? क्या आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था में सुधार होना चाहिए या सामाजिक न्याय के लिए जाति आधारित आरक्षण को जारी रखना जरूरी है? क्या आरक्षण का आधार जाति होना चाहिए या आर्थिक स्थिति? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।



