भागीरथपुरा में गंदे पानी से हुई 35 मौतों की जांच रिपोर्ट ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। इसमें नेताओं को पूरी तरह से क्लीन चिट दी गई है और सारा ठीकरा अफसरों पर फोड़ा गया है। अब सवाल यह है कि क्या इंदौर में नगर निगम परिषद नहीं है और अगर है तो उसे कौन चला रहा है? क्या इंदौर में कोई मंत्री, विधायक या सांसद नहीं है और अगर है तो वह क्या कर रहा है?
विडंबना यह कि जिस इलाके में ऐसी लापरवाही हुई, वह इलाका प्रदेश के नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की विधानसभा में आता है। और शायद यह सबको पता है कि नगर निगम कैलाश विजयवर्गीय के मंत्रालय के अंतर्गत ही आता है।
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क्या महापौर, पार्षद और मंत्री की यह जिम्मेदारी नहीं है कि वे अपने विधानसभा के लोगों को कम से कम साफ पानी पिलाएं। भागीरथपुरा में जो कुछ हुआ, क्या उसका अंदाजा क्षेत्रीय पार्षद को नहीं था? पार्षद ने अपनी ओर से क्या कोशिश की? महापौर ने नहीं नहीं सुनी होगी तो मंत्री के पास गया होगा?
क्या इंदौर की जनता को कोई बता पाएगा कि नगर निगम को कौन चला रहा है? आखिर वहां 85 पार्षद क्या कर रहे हैं? वे हर चुनाव में वोट मांगने दर-दर क्यों जाते हैं और उनकी जिम्मेदारी क्या है?
अगर नगर निगम परिषद का कोई दोष नहीं है और वहां सिर्फ अफसरों का राज है तो फिर चुनाव कराने के क्या मायने?
राजनीतिक रूप से मुर्दा हो चुके इस शहर में आखिर नेताओं की जरूरत क्या है?
अगर आप शहर के जिम्मेदार नागरिक हैं और आपको अपने शहर की चिन्ता है तो अगले चुनाव में इन नेताओं को अपने दरवाजे पर मत आने दीजिए…इनकी रैलियों में मत जाइए…ये जब आपके मोहल्ले में आएं तो इन्हें फूलमाला मत पहनाइए…इनके घर पर दरबार लगाने की भी जरूरत नहीं…
जब शहर को अफसर ही चला रहे हैं, हर अच्छे-बुरे काम की जिम्मेदारी उनकी ही है, तो फिर इन नेताओं का क्या काम?



