इंदौर। महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने 5 अगस्त 2022 को इंदौर के महापौर के रूप में शपथ लिया था। जनता ने उन्हें इसलिए चुना था कि वे उनका काम करेंगे। शहर हित में फैसले लेंगे और अधिकारियों पर नकेल कस कर जनता का भला करेंगे। लेकिन, ऐसा कुछ हुआ नहीं। महापौ जी, अपने ही धुन में मस्त रहे और जनता बेचारी ठगा सा महसूस करती रही।
सुदामा नगर का मामला था दर्द उठा
गुरुवार सुबह महापौर पुष्यमित्र भार्गव अपने गृह मोहल्ले सुदामा नगर सेक्टर-डी का औचक निरीक्षण किया था। इस दौरान बाउंड्रीवॉल का टेंडर होने के बावजूद वर्कऑर्डर जारी नहीं होने की जानकारी मिली। इस पर महापौर ने मौके से ही संबंधित अधिकारियों को बुलाकर जवाब मांगा।
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जनता की परेशानी आज समझ आई
महापौर ने नाराजगी जताते हुए कहा कि आप लोग कागज-कागज खेलते रहते हो और यहां जनता परेशान होती रहती है। आपके कारण सरकार की छवि खराब होती है। टेंडर किस आधार पर हुआ और प्रक्रिया वर्कऑर्डर तक कैसे पहुंची? उन्होंने पूरे मामले की जांच कराने के निर्देश दिए, ताकि देरी के लिए जिम्मेदार लोगों का पता चल सके।
लंबित फाइलों की सूची बनाने को कहा
महापौर ने अधिकारियों से ऐसे सभी मामलों की सूची तैयार करने को कहा कि जिनकी फाइलें बिना उचित कारण लंबित हैं। इन प्रकरणों की जांच कराकर नगर निगम आयुक्त के समक्ष रखा जाएगा। इसके बाद एमआईसी में रिपोर्ट प्रस्तुत की जाएगी। महापौर ने जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश भी दिए।
आज निकले तो ड्रेनेज लाइन की गड़बड़ी भी मिली
महापौर को निरीक्षण के दौरान ड्रेनेज लाइन के काम में ठेकेदार की लापरवाही की शिकायतें भी मिलीं। महापौर ने कहा कि अधिकारियों की लेटलतीफी के कारण आम लोगों को बार-बार परेशान होना पड़ता है। जनप्रतिनिधियों को भी रोजाना जनता की शिकायतें सुननी पड़ती हैं। छोटी-छोटी समस्याओं के लिए महापौर को मौके पर पहुंचकर फाइलें निकलवानी पड़ें, यह अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल है।
भागीरथपुरा में लापरवाही से हुई थी मौतें
भागीरथपुरा में गंदे पानी से मौतों की जांच में भी लापरवाही सामने आई थी। जांच रिपोर्ट में सारा ठीकरा अधिकारियों पर फोड़ा गया था। यहां सवाल यह है कि जब हर वार्ड में पार्षद हैं, नगर निगम की पूरी कमान महापौर के पास है तो फिर काम कैसे नहीं होते?
लोग कह रहे हैं-आखिर आप क्या कर रहे हो?
लंबे समय से आम जनता के काम रुके हुए हैं। पार्षद भी हैरान-परेशान हैं, लेकिन महापौर जी शांत बनकर अपनी छवि सुधारने में जुटे रहते हैं। जनता पार्षद से शिकायत करती और पार्षद महापौर के पास जाते हैं, फिर भी काम नहीं होते। यहां सवाल यह है कि आखिर अधिकारी आपकी नहीं सुन रहे या आप ही अधिकारियों तक बात नहीं पहुंचा पा रहे।
हर निगमायुक्त खराब कैसे हो सकता?
महापौर जी ने जब से कामकाज संभाला है, तब से किसी भी निगमायुक्त से उनकी नहीं बनी। ऐसा पहली बार ही है। पूर्व के महापौरों ने शायद ही कभी किसी निगमायुक्त की शिकायत की होगी। वर्तमान महापौर हर निगमायुक्त की शिकायत सीएम से लेकर संगठन तक करते रहे हैं। शासन नया निगमायुक्त भेजता है, फिर कुछ दिन बाद महापौर उसके खिलाफ भी हो जाते हैं।



