पश्चिम एशिया में एक महीने से अधिक समय से जारी संघर्ष के बीच अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्तों के युद्धविराम की घोषणा हुई, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान की भूमिका पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स में इन दावे की परतें खोलते हुए कहा गया है कि पाकिस्तान कोई निष्पक्ष मध्यस्थ नहीं था, बल्कि व्हाइट हाउस ने उसे केवल एक माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया। रिपोर्ट के अनुसार, शहबाज शरीफ की भूमिका महज एक दर्शक और संदेश पहुंचाने वाले की रही।
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बताया गया कि जहां एक ओर शरीफ सार्वजनिक रूप से युद्धविराम का प्रस्ताव देते नजर आए, वहीं दूसरी ओर आसिम मुनीर ने सीधे तौर पर डोनाल्ड ट्रंप, जेडी वेंस और स्टीव विटकॉफ से बातचीत की।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि पाकिस्तान को इस प्रक्रिया में इसलिए शामिल किया गया क्योंकि यह माना गया कि ईरान, एक मुस्लिम बहुल पड़ोसी देश के जरिए आए प्रस्ताव को अधिक स्वीकार कर सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक बड़ी चूक भी सामने आई, जब शहबाज शरीफ की सोशल मीडिया पोस्ट में ड्राफ्ट-पाकिस्तांस पीएम मैसेज जैसा वाक्य भी प्रकाशित हो गया। इससे यह संकेत मिला कि संदेश पहले से तैयार किया गया था। हालांकि बाद में पोस्ट को सुधार दिया गया, लेकिन तब तक इसके स्क्रीन शॉट वायरल हो चुके थे।
वहीं लेबनान को युद्धविराम में शामिल बताने के पाकिस्तान के दावे को डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू ने खारिज कर दिया, जिसके बाद इजराइल ने हिजबुल्ला पर हमले जारी रखे।
उधर भारत में इजरायल के राजदूत रूवेन अजार ने भी पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि इजराइल उसे एक “भरोसेमंद पक्ष” के रूप में नहीं देखता। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका ने अपने हितों के अनुसार पाकिस्तान का इस्तेमाल किया है, जैसा कि पहले कतर और तुर्की के साथ भी किया जा चुका है।
कुल मिलाकर, इस रिपोर्ट ने पाकिस्तान की मध्यस्थता की छवि पर सवाल खड़े करते हुए यह संकेत दिया है कि वैश्विक कूटनीति में उसकी भूमिका उतनी प्रभावशाली नहीं रही, जितना वह दिखाने की कोशिश कर रहा था।



