‘मिनी’ को ‘जम्बो’ बनाने के लिए क्या ‘स्टेरॉयड’ दे दोगे?

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‘नईदुनिया’ में प्रकाशित मेरा यह कॉलम वर्षों बाद जब पिछले मंगलवार ‘एचबीटीवीन्यूज’ में लोगों को दिखा, तब से मुझे मार्निंग वॉक में सावधानी रखनी पड़ रही है। खैर, पिछली बार विदेशों में लग रहे पेड़ों से इंदौर में आती हवा की बातें सुनकर मैंने मॉर्निंग वॉक से तो कन्नी काट ली, लेकिन आयोजनों में जाने से खुद को रोक नहीं पाया।
अभी सोमवार को ही एक साहित्यिक समारोह में जाना हुआ। बीच में चाय के लिए ब्रेक हुआ और मैं भी सबके साथ चाय-नाश्ते पर लपक पड़ा। मैं परिचितों से बात कर ही रहा था कि तभी पीठ पर किसी का हाथ पड़ा। पलट कर देखा तो एक परिचित डॉक्टर साहब नजर आए।
मुझसे बोले-तुम्हारा ‘घुमक्कड़’ पढ़ा था।
मेरा दिमाग तिरी-भिन्नाट हो गया। जिस डर से मार्निंग वॉक छोड़ी, वह तो मेरा पीछा ही नहीं छोड़ रहा।
इतने में उन्होंने कहा-तुम शहर के विकास पर क्यों नहीं लिखते?
मैंने कहा-समय-समय पर लिखता रहता हूं।
डॉक्टर साहब मेरा हाथ पकड़ कर आयोजन स्थल मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति के बाहर ले आए और आरएनटी मार्ग पर फंसे वाहन दिखाने लगे। जाम के कारण समिति के गेट से बाहर निकलने का रास्ता भी नहीं था।
मैंने कहा- आबादी बढ़ गई है, शाम को जाम लगने लगता है।
डॉक्टर साहब बोले- तुम्हें पता है कि मधुमिलन चौराहा कितने समय से खुदा पड़ा है। रोटरी तो छोटी हो गई, लेकिन सड़क बनाने में साल गुजर गए। और तो और अधिकारियों से लेकर नेताओं और एक्सपर्ट तक को यह समझ नहीं आ रहा कि यहां से ट्रैफिक कैसे निकालें?
मैंने कहा-जब पूरा बन जाएगा तो सब ठीक हो जाएगा।
डॉक्टर साहब ने पूछा-लेकिन कब?
मैं कुछ जवाब देता इससे पहले ही उन्होंने फिर मुझे दबोच लिया। कहा-यह सिर्फ मधुमिलन चौराहे की समस्या नहीं है, जहां-जहां प्रयोग हो रहे हैं, वहां यही परेशानी है।
मैंने कहा-शहर में ट्रैफिक को लेकर लगातार काम हो रहा है। महापौर से लेकर मंत्री तक सक्रिय हैं। जवाहर मार्ग को वन वे करना, राजवाड़ा पर ई-रिक्शा प्रतिबंधित करना जैसे कई प्रयोग हुए हैं।
डॉक्टर साहब बोले-कितने दिन तक चला यह प्रयोग? जरा अब जाकर देख लो? सबकुछ पहले जैसा ही है। अरे, घोषणा और आदेश के बाद कोई दोबारा जाकर झांकता भी है? जिस महापौर और मंत्री की बात कर रहे हो, वे तो बेचारे 51 लाख पौधे जुटाने और उसके लिए गड्ढे खुदवाने में व्यस्त हैं।
मैंने कहा-ऐसा नहीं, शायद आप भूल रहे हैं कि वर्तमान में जो हमारे मंत्री हैं, उन्होंने ही शहर में विकास की नींव रखी थी।
डॉक्टर साहब ने कहा-मुझे मत समझाओ विकास। एक विभाग सड़कें बनवाता है। उस पर ट्रैफिक चालू होते ही दूसरा विभाग जेसीबी लेकर पाइप डालने पहुंच जाता है। फिर गड्ढे कर जनता को गिरने के लिए छोड़ जाता है। महीनों इनकी मरम्मत तक नहीं होती और जब होती है तो ऐसी की फिर सड़क चलने लायक नहीं रहती।
मैंने कहा-सब जगह ऐसा नहीं है। महापौर, निगमायुक्त और एमआईसी मेंबर भी दौरा करते रहते हैं, गड्ढे नहीं भरने पर पेनल्टी भी लगाई गई है।
डॉक्टर साहब बोले- इतना बड़ा निगम का अमला घूमता तो रहता है, क्यों नहीं हाथोंहाथ मरम्मत कराई जाती है। अगर निगरानी रखी जाए तो ठेकेदार कैसे नहीं करेगा काम?
मैंने कहा-निगम के पास और भी बहुत सारे काम हैं, अब ऐसे कामों के लिए अमला कहां से आएगा?
डॉक्टर साहब ने कहा-अमले की कमी की तो बात ही मत करो। किसी भी गली-कूचे के खाली प्लॉट पर दो बोरी सीमेंट, थोडी ईंट और रेती रख आओ। फिर देखो निगम के अमले का कमाल। सात ताले में भी बंद रहोगे, तो भी निगम का अमला आपके पास ‘फीस’ मांगने पहुंच जाएगा। अरे, यह वही निगम है जहां बिना काम के करोड़ों के फर्जी बिल भी पास हो जाते हैं।
मैंने कहा-चलो एक बार के लिए मान भी लिया कि भ्रष्टाचार है, फिर भी शहर का विकास तो हो रहा है।
डॉक्टर साहब बोले- आप इंदौर को ‘मिनी बांबे’ से ‘लार्ज’ भी नहीं सीधे ‘जम्बो बांबे’ बनाना चाहते हो। और यह सब शहर की जरूरत के हिसाब से ‘दवाएं’ देने से तो होगा नहीं, जाहिर है इसके लिए ‘स्टेरॉयड’ की जरूरत पड़ेगी। आप वही दे रहे हो और ‘स्टेरॉयड’ का नफा-नुकसान मुझ डॉक्टर को समझाने की जरूरत नहीं…।
तभी बारिश की बूंदों ने मेरी जान बचाई और मैं उनकी हां में हां मिलाकर वहां से चला आया।

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