इंदौर।. कांग्रेस नेता राहुल गांधी का कार्यक्रम छात्रों की गूंज का इंदौर एडिशन संपन्न होने के बाद इसको लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं। भाजपा की बात छोड़ भी दें, तो कार्यक्रम में शामिल हुए लोग भी कुछ मुद्दों पर इसकी आलोचना कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि कार्यक्रम में दम था, भीड़ भी जुट गई थी, माहौल भी बन गया था, लेकिन कमजोर स्क्रिप्ट के कारण यह सुपर हिट नहीं हो पाई।
कार्यक्रम का प्रारूप संवादात्मक था और राहुल गांधी ने लगभग एक घंटे तक छात्रों से बातचीत की। इसमें समस्याएं गिनाने के मुकाबले उनके ठोस समाधान, स्पष्ट रोडमैप और आंकड़ों का प्रस्तुतीकरण कम दिखाई दिया। इसके ही राहुल एक मुद्दे पर ठीक से बोल भी नहीं पाते थे कि बीच में मच पर छात्र पहुंच जाते थे। इस व्यवधान के कारण भी लोगों को मजा नहीं आया।
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पीएम मोदी की मिमिक्री ने किया कबाड़ा
कार्यक्रम में स्टैंडअप कॉमेडियन पुलकित मणि ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नकल की। इसमें प्रधानमंत्री की दिवंगत मां से जुड़ी टिप्पणी भी हुई। यह सब तब हुआ जब राहुल गांधी पूरा माहौल बना चुके थे और लोग उनको ही सुनना चाहते थे। कार्यक्रम में मौजूद अधिकांश लोगों को यह अटपटा लगा।
भाजपा को मिला हमले का मौका
भाजपा ने कार्यक्रम को ‘झूठ की गूंज’ कहकर निशाना बनाया और आरोप लगाया कि कांग्रेस ने छात्रों की समस्याओं को राजनीतिक मुद्दे में बदल दिया। दूसरी तरफ कांग्रेस इसे छात्रों की वास्तविक समस्याओं को सामने लाने वाला मंच बता रही है। इसलिए कार्यक्रम का राजनीतिक नैरेटिव उसके छात्र-केंद्रित उद्देश्य पर भारी पड़ता दिखाई दिया।
और धारदार हो सकता था प्रेजेन्टेशन
कार्यक्रम में छात्रों ने अपनी समस्याएं सीधे राहुल गांधी के सामने रखीं और राहुल ने पारंपरिक भाषण की जगह संवाद पर जोर दिया। यह कार्यक्रम पारंपरिक राजनीतिक रैली की शैली से अलग था। करीब एक घंटे तक उन्होंने छात्रों से सीधे संवाद किया और कई छात्रों को अपनी समस्याएं रखने का मौका दिया। लोगों का तर्क है कि जिस कार्यक्रम को कांग्रेस ने छात्रों के मुद्दों पर केंद्रित बड़े राष्ट्रीय मंच के रूप में पेश किया था, उसमें राहुल गांधी का संदेश उतना धारदार दिखाई नहीं दिया। रोजगार, भर्ती, पेपर लीक, शिक्षा और संस्थागत समस्याओं जैसे मुद्दे उठे, जिन पर राहुल और जोरदार तरीके से तथ्यों सहित वार कर सकते थे।
कांग्रेस से जुड़े लोगों को मंच पर नहीं आना था
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में युवाओं की मौजूदगी भी कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रही। भाजपा ने आरोप लगाया कि मंच पर अपनी समस्याएं रखने वाले कुछ छात्र कांग्रेस या उससे जुड़े संगठनों से राजनीतिक रूप से जुड़े रहे हैं। भाजपा के इन आरोपों को रिपोर्ट किया है और जिन नामों का उल्लेख हुआ, उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि को लेकर भाजपा ने सोशल मीडिया पर सामग्री भी जारी की।
इस भीड़ को अब अपना बनाने की चुनौती
कार्यक्रम में बड़ी भीड़ जुटाना संगठनात्मक सफलता हो सकती है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि छात्रों का स्थायी राजनीतिक समर्थन कांग्रेस के साथ आ गया है। असली कसौटी यह होगी कि कांग्रेस इन छात्रों की समस्याओं पर कार्यक्रम के बाद क्या ठोस पहल करती है।
कांग्रेस को मानना चाहिए भाजपा का एहसान
इस कार्यक्रम में जुटी भीड़ के लिए कांग्रेस को भाजपा का एहसान मानना चाहिए। सरकार ने अपनी सभी विभागों का जागृत कर दिया और उन्होंने कदम-कदम पर रोड़े अटकाए। सबसे हास्यास्पद पुलिस विभाग की 31 शर्तें रहीं, जो राहुल के पिता स्व.राजीव गांधी की सुरक्षा का हवाला देकर जारी की गई थीं। इसके बाद भी पुलिस का मन नहीं भरा तो वे मंच पर भी एक्शन दिखाने पहुंच गए। रही-सही कसर चोरी-छुपे रात के अंधेरे में लगाए गए पोस्टर-बैनर झूठ की गूंज ने पूरा कर दिया।
चाहे तो भाजपा ले सकती है सबक
इस कार्यक्रम की भाजपा भले ही हर तरह से आलोचना करे, लेकिन उससे सबक लेना चाहिए। राहुल के कार्यक्रम के दो दिन पहले ही भाजपा ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का आयोजन किया था। इसके लिए सरकार के सारे विभागों के साथ ही भाजपा का पूरा संगठन लगा रहा। बसों में भर-भरकर लोग लाए गए, लेकिन संख्या का मुकाबला छात्रों की भीड़ से नहीं किया जा सकता। भाजपा एक बार दिल पर हाथ रख कर सोचे कि आखिर बिना बस का किराया, खाना-खर्चा और पद के लालच दिए इतने छात्र कहां से जुट गए? खैर, आगे भाजपा खुद ही समझदार है। जंतर-मंतर की भीड़ भी शायद उसे याद ही होगी।



