प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस संबोधन में ‘दिमागी नक्सल’ शब्द के इस्तेमाल के बाद देश की सियासत में नया विवाद छिड़ गया है। 15 अगस्त को लाल किले से दिए भाषण में पीएम मोदी ने कहा था कि सशस्त्र नक्सलवाद कमजोर हुआ है, लेकिन वैचारिक स्तर पर देश में अशांति फैलाने वालों से सतर्क रहने की जरूरत है। प्रधानमंत्री ने किसी व्यक्ति या पार्टी का नाम नहीं लिया था।

इसके बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने रविवार को सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए इस टिप्पणी पर तीखा पलटवार किया। चिदंबरम ने कहा कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ कहे जाने पर गर्व है। उनके इस बयान के बाद BJP बनाम Congress की राजनीतिक बहस और तेज हो गई।
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BJP का पलटवार—‘24 घंटे में सामने आ गए दिमागी नक्सल’
चिदंबरम के बयान को लेकर भाजपा ने कांग्रेस और विपक्ष पर हमला बोला। भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि प्रधानमंत्री के बयान के 24 घंटे के भीतर ही ‘दिमागी नक्सल’ सामने आ गए।
भाजपा का आरोप है कि चिदंबरम का बयान इस बात का उदाहरण है कि प्रधानमंत्री ने जिन वैचारिक ताकतों को लेकर चेतावनी दी थी, वे राजनीतिक प्रतिक्रिया के रूप में सामने आ रही हैं। दूसरी ओर, विपक्ष इस शब्द को असहमति और आलोचना की आवाज को निशाना बनाने वाला राजनीतिक लेबल बता रहा है। इस मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच तीखी बयानबाजी जारी है।
क्यों बढ़ रहा है विवाद?
‘दिमागी नक्सल’ शब्द अब सोशल मीडिया और राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बन चुका है। सवाल यह है कि प्रधानमंत्री की टिप्पणी का वास्तविक राजनीतिक और वैचारिक दायरा क्या है और क्या इस शब्द का इस्तेमाल लोकतांत्रिक असहमति के संदर्भ में किया जाना चाहिए?
फिलहाल, PM Modi Speech, P Chidambaram Statement और BJP-Congress controversy सोशल मीडिया पर चर्चा के प्रमुख विषय बने हुए हैं।
बड़ा सवाल
क्या ‘दिमागी नक्सल’ जैसे राजनीतिक शब्द देश में वैचारिक बहस को मजबूत कर रहे हैं या राजनीतिक ध्रुवीकरण को और बढ़ा रहे हैं?
आप इस पूरे विवाद को कैसे देखते हैं? क्या पी. चिदंबरम का बयान सही राजनीतिक जवाब था या इससे विवाद और बढ़ा है? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।



