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नई दिल्ली। इन दिनों आरएसएस महासचिव दत्तात्रेय होसबोले के संविधान की प्रस्तावना से धर्मनिरेपक्ष और समाजवाद शब्द हटाने को लेकर दिए गए बयान पर विवाद चल रहा है। कांग्रेस ने तो इस पर जमकर पलटवार किया है। इसी बीच आज यानी शनिवार को उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भी इसी मुद्दे को छेड़ दिया है।
शनिवार को हुए एक कार्यक्रम में उपराष्ट्रपति धनखड़ ने 50 साल आपातकाल के पूरे होने पर संविधान और प्रस्तावना को लेकर बात की। उपराष्ट्रपति ने कहा कि आपातकाल के दौरान प्रस्तावना में जो धर्मनिरेपक्ष और समाजवाद शब्द जोड़े गए, वे नासूर हैं। सनातन की आत्मा के साथ अपमान किया गया। कितनी बड़ी अन्याय की विडंबना है, पहले हम उस चीज को बदलते हैं, जो बदली नहीं जानी चाहिए और फिर वह भी तब, जब देश में आपातकाल लगा हो। उपराष्ट्रपति धनखड़ ने कहा कि प्रस्तावना संविधान की आत्मा है और उस समय इसे सम्मान मिलना चाहिए था न कि तोड़ा-मरोड़ा और ध्वस्त किया जाना चाहिए था। देखा जाए तो भारत को छोड़ किसी भी देश के संविधान के साथ कोई बदलाव नहीं किया गया। एक गंभीर कार्य, जिसे बदला नहीं जाना चाहिए था, उसे हल्के में और मजाक की तरह लेकर पूरी तरह मर्यादाहीन तरीके से बदल दिया गया।
संविधान की मूल भावना को समझें युवा
उल्लेखनीय है कि 1976 में आपातकाल के दौरान संविधान की प्रस्तावना में समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और राष्ट्रीय एकता और अखंडता जैसे शब्द जोड़े गए थे। उपराष्ट्रपति ने इन शब्दों को जोड़ने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। धनखड़ ने कहा कि आपातकाल भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का काला अध्याय था, और यह आवश्यक है कि आज की पीढ़ी इससे सबक ले। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे संविधान की मूल भावना को समझें और उसकी रक्षा करें।



