शहर के ‘ख्यात’ लोगों को मात्र 2 करोड़ 26 लाख सालाना पर रीजनल पार्क सौंपने जा रहा है निगम, 27 साल तक कंपनी करेगी जनता का ‘दोहन’

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इंदौर। नगर निगम इंदौर शहर में जमीनों, बिल्डिगों और मॉल में भारी गड़बड़ी करने वाले लोगों को रीजनल पार्क सौंपने जा रहा है। यह वही रीजनल पार्क है जिसे मधु वर्मा के अध्यक्षीय कार्यकाल में इंदौर विकास प्राधिकरण ने 55 करोड़ खर्च कर बनाया था। चूंकि नगर निगम इसे चला नहीं सका, इसलिए इसे निजी हाथों में सौंपा जा रहा है, लेकिन आखिर इतनी कम राशि में इसे उन लोगों को सौंपने की जल्दी क्यों है जो शहर में गड़बड़ियों और घोटालों के लिए ख्यात हैं।

उल्लेखनीय है कि इंदौर विकास प्राधिकरण ने 2011 में इस पार्क को नगर निगम के हवाले सौंपा था, तब से इसकी बदहाली शुरू हो गई। करीब 40 एकड़ में फैला यह पार्क पूरी तरह बर्बाद हो चुका है और इसकी पूरी जिम्मेदार नगर निगम की ही है। अब इस पार्क को 27 साल के लिए निजी कंपनी को देने की तैयारी हो गई है। टेंडर आ चुके हैं, बस महापौर परिषद में मंजूरी का इंतजार है। इससे पहले जो टेंडर बुलवाए गए थे उसमें 1.33 करोड़ रुपए का रेट आया था, जिसे नामंजूर कर दिया गया।

एम्यूजमेंट पार्क के नाम पर जमकर मचेगी लूट

नगर निगम की शर्तों के हिसाब से टेंडर लेने वाली कंपनी एम्यूजमेंट पार्क के साथ ही अन्य गतिविधियां भी शुरू करेगी। निगम की टेंडर शर्तों के मुताबिक पार्क का कुल एरिया15 हेक्टेयर है। इसमें अभी वर्तमान में करीब 11 हेक्टेयर में पार्क है। इसें से 4 हेक्टेयर एम्जूयमेंट पार्क के लिए रिजर्व है। निगम क शर्तों के मुताबिक पार्क के रिनोवेशन पर 18 करोड़ रुपए खर्च होने हैं, जबकि 22 कोरड़ से एम्जूयमेंट पार्क बनना है। यह काम 18 महीने में पूरा होना है। इसके बाद 27 साल तक ठेका लेने वाली कंपनी इसका दोहन करेगी।

फूड कोर्ट से लेकर पार्टी लॉन तक

जो कंपनी ठेका लेगी वह इसें फूट कोर्ट से लेकर पार्टी लॉन तक बनाएगी। इसका मतलब साफ है कि बड़ी-बड़ी कंपनियों के स्टॉल रहेंगे, जहां महंगे दर पर खाना मिलने के साथ ही पार्टी लॉन का भी मोटा किराया वसूला जाएगा। जो लोग टेंडर ले रहे हैं, वह इसका और किस तरह इस्तेमाल करेंगे यह भी किसी से छुपा नहीं है। जाहिर है कि 22 करोड़ खर्च कर कंपनी इससे कई गुना ज्यादा रकम कमाएगी। इसके बाद नगर निगम को हर साल मिलेंगे मात्र 2 करोड़ 26 लाख रुपए।

टेंडर लेने वाली कंपनी के कारनामे जाहिर

जिस कंपनी को नगर निगम टेंडर देने जा रहा है वह कंपनी राजेश मेहता और गुरजीत सिंह छाबड़ा यानी पिंटू छाबड़ा की है। इसका ऑफिस पिंटू छाबड़ा के सी-21 बिजनेस पार्क में हैं। ऑरेंज मेगास्ट्रक्चर एलएलपी के भागीदार राजेश मेहता और पिंटू छाबड़ा हैं, जबकि इसकी दूसरी कंपनी रिक्लूसिव रियल एस्टेट एंड एंटरटेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड के डारेक्टर पिंटू छाबड़ा और करण सिंह छाबड़ा हैं। इन दोनों की पहचान शहर के लोगों से छुपी नहीं है। एबी रोड पर चाय व्यापारियों के प्लॉट पर दो-दो मॉल तानने के बाद तृष्णा गृह निर्माण संस्था की विवादित जमीन पर सी 21 बिजनेस पार्क बनाने वाले पिंटू छाबड़ा को रीजनल पार्क जैसी बेशकीमती सरकारी संपत्ति सौंपना क्या जायज है?

किसी बाहरी कंपनी को टेंडर क्यों नहीं?

भाजपा और महापौर परिषद के सदस्यों का मानना है कि अगर बाहर कि किसी बड़ी कंपनी को यह टेंडर दिया जाए तो नगर निगम को ज्यादा लाभ हो सकता है। जब निगम अपनी माली हालत सुधारने के लिए रीजनल पार्क निजी हाथों में सौंपने जा रहा है, तो इसमें निगम का फायदा भी देखना चाहिए। इसके विपरित महापौर पुष्यमित्र भार्गव इंदौर की कंपनी को टेंडर देने की पुरजोर कोशिश में जुटे हैं।

पूरे खेल में एक आर्किटेक्ट कम कंसल्टेंट का हाथ

सूत्र बताते हैं कि इस पूरे खेल में शहर के एक प्रसिद्ध आर्किटेक्ट कम कंसल्टेंट का हाथ है। जो नगर निगम, इंदौर विकास प्राधिकरण से लेकर कई विभागों में कंसल्टेंट हैं। उन पर ईओडब्ल्यू तक ने केस कर रखा है। कई बड़े घोटाले में उनका नाम आता है, लेकिन अपनी ऊंची पहुंच के कारण वे बच निकलते हैं। वर्तमान महापौर पुष्यमित्र भार्गव भी इनसे परेशान थे और कुछ समय पहले तक वे इनसे पीछा छुड़ाने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन, पता नहीं अचानक इनसे और इनकी पार्टियों से महापौर का प्रेम कैसे जाग उठा? आप भी नाम समझ ही गए होंगे। अब वही आर्किटेक्ट कम कंसल्टेंट इस ठेके को अंजाम तक पहुंचाने में जी-जान से जुटे हैं।

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