पिंटू छाबड़ा और राजेश मेहता के हाथ नहीं आया रीजनल पार्क, कमिश्नर शिवम वर्मा ने नया डीपीआर बनाकर फिर से टेंडर के दिए आदेश

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इंदौर। इंदौर विकास प्राधिकरण द्वारा अरबों रुपए की जमीन पर करीब 55 करोड़ रुपए से बने रीजनल पार्क को निगम कमिश्नर शिवम वर्मा ने औने-पौने दाम पर गलत हाथों में जाने से बचा लिया है। इसकी डीपीआर से लेकर टेंडर प्रक्रिया में भारी गड़बड़ी मिलने के बाद कमिश्नर ने निगम और शहरहित में यह फैसला लिया है। अब इसकी डीपीआर फिर से तैयार कर टेंडर बुलाए जाएंगे। इस संबंध में निगमायुक्त ने सचिव को पत्र लिख दिया है।

निगमायुक्त ने सचिव को लिखे पत्र में कहा है कि रीजनल पार्क में चूंकि बड़ा सा तालाब है। इसलिए यहां वाटर स्पोटर्स आदि को लेकर काफी गतिविधियां हो सकती हैं। वर्तमान डीपीआर में कई चीजें छूट गई हैं। इसलिए फिर से नई डीपीआर तैयार की जाए। इसके बाद टेंडर किए जाएंगे। उल्लेखनीय है कि इंदौर विकास प्राधिकरण ने नगर निगम को यह पार्क चमचमाती हालत में सौंपा था, लेकिन जनप्रतनिधि और अधिकारियों द्वारा ध्यान नहीं देने के कारण यह बदहाल होता गया। इंदौर विकास प्राधिकरण के तत्कालीन अध्यक्ष मधु वर्मा ने इसे काफी रुचि लेकर बनाया था और इसके लिए वे दिनरात जुटे रहे लेकिन निगम ने उनकी मेहनत और जनता के पैसे पर पूरी तरह पानी फेर दिया। अगर निगम ठीक से रखरखाव करता तो आज इसे ठेके पर देने की नौबत नहीं आती।

2 करोड़ 26 लाख सालाना में देने की थी तैयारी

नगर निगम अब रीजनल पार्क को ठेके पर देने की पूरी तैयारी कर चुका था। वह भी 55 करोड़ रुपए खर्च कर अरबों रुपए की जमीन पर बने पार्क को मात्र 2 करोड़ 26 लाख रुपए सालाना में निजी कंपनी को सौंपा जा रहा था। यह पार्क नगर निगम के कारण ही बदहाल हुआ, फिर भी बताया जा रहा है कि इससे अभी भी नगर निगम को 70 लाख रुपए सालाना की कमाई हो रही है। ऐसे में 2 करोड़ 26 लाख में 27 साल के लिए इसे किसी निजी हाथ में सौंपना उचित नहीं है।

जमीन के सौदागरों की थी नजर

जिस कंपनी को नगर निगम टेंडर देने जा रहा था वह कंपनी राजेश मेहता और गुरजीत सिंह छाबड़ा यानी पिंटू छाबड़ा की है। इसका ऑफिस पिंटू छाबड़ा के सी-21 बिजनेस पार्क में हैं। ऑरेंज मेगास्ट्रक्चर एलएलपी के भागीदार राजेश मेहता और पिंटू छाबड़ा हैं, जबकि इसकी दूसरी कंपनी रिक्लूसिव रियल एस्टेट एंड एंटरटेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड के डारेक्टर पिंटू छाबड़ा और करण सिंह छाबड़ा हैं। ये लोग इंदौर शहर के जमीन के बड़े सौदागर हैं।

ठेके को लेकर उठ रहे थे सवाल

जब से इसकी टेंडर प्रक्रिया शुरू हुई तब से यह मामला विवादों में रहा। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा था कि जिस कंपनी ने सबसे ज्यादा रेट भरे हैं, उसने टेंडर में आठ बार संशोधन किए हैं। महापौर परिषद के कई सदस्य, पार्षद तथा भाजपा के नेताओं ने भी इसे ठेके पर देने को लेकर सवाल खड़े किए थे। कई नेताओं का कहना है कि जब करीब 70 लाख की कमाई इस हाल में हो रही है, तो इस पर थोड़ा ध्यान देकर, संवार कर यह कमाई बढ़ाई जा सकती है।

डीपीआर बनाने में भी गड़बड़ी

बताया जाता है कि ठेके के इस खेल में एक पूरी टीम सक्रिय हैं। सूत्र बताते हैं कि इसें एक मंत्री से लेकर प्रसिद्ध आर्किटेक्ट भी शामिल हैं। यह वही आर्किटेक्ट हैं जो नगर निगम के कई प्रोजेक्ट में कंसल्टेंट भी हैं। बताया जाता है कि यही आर्किटेक्ट डीपीआर भी तैयार करवाते हैं और फिर टेंडर भी दिलवाते हैं। इस बार नगर निगम डीपीआर और टेंडर प्रक्रिया में पूरी सावधानी रखेगा।

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