रीजनल पार्क से हर साल करीब 70 लाख कमाता है नगर निगम, फिर दो करोड़ 26 लाख में क्यों दे रहा ठेका, चाहे तो खुद ही इतना कमा ले

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इंदौर। लगातार उठ रहे विवादों के बाद भी नगर निगम अब रीजनल पार्क को ठेके पर देने की पूरी तैयारी कर चुका है। वह भी 55 करोड़ रुपए खर्च कर अरबों रुपए की जमीन पर बने पार्क को मात्र 2 करोड़ 26 लाख रुपए सालाना में निजी कंपनी को सौंपा जा रहा है। यह पार्क नगर निगम के कारण ही बदहाल हुआ, फिर भी बताया जा रहा है कि इससे अभी भी नगर निगम को 70 लाख रुपए सालाना की कमाई हो रही है। ऐसे में 2 करोड़ 26 लाख में 27 साल के लिए इसे किसी निजी हाथ में सौंपना समझ से परे है।

उल्लेखनीय है कि इंदौर विकास प्राधिकरण ने नगर निगम को यह पार्क चमचमाती हालत में सौंपा था, लेकिन जनप्रतनिधि और अधिकारियों द्वारा ध्यान नहीं देने के कारण यह बदहाल होता गया। इंदौर विकास प्राधिकरण के तत्कालीन अध्यक्ष मधु वर्मा ने इसे काफी रुचि लेकर बनाया था और इसके लिए वे दिन-रात जुटे रहे लेकिन निगम ने उनकी मेहनत और जनता के पैसे पर पूरी तरह पानी फेर दिया। अगर निगम ठीक से रखरखाव करता तो आज इसे ठेके पर देने की नौबत नहीं आती।

खुद ही फूड कोर्ट और पार्टी लॉन क्यों नहीं बना सकते?

महापौर परिषद के कई सदस्य, पार्षद तथा भाजपा के नेताओं ने भी इसे ठेके पर देने को लेकर सवाल खड़े किए हैं। कई नेताओं का कहना है कि जब करीब 70 लाख की कमाई इस हाल में हो रही है, तो इस पर थोड़ा ध्यान देकर, संवार कर यह कमाई बढ़ाई जा सकती है। दूसरी कंपनी को फूड कोर्ट ठेके पर देने की बजाए निगम खुद भी तो दुकानें किराए पर दे सकता है। पार्टी लॉन तो निगम भी डेवलप कर सकता है और ऐसे प्राइम लोकेशन पर जहां कई होटलें चल रही हैं अच्छी कमाई हो सकती है। इससे निश्चित तौर पर 70 लाख का आंकड़ा दो करोड़ तक पहुंच सकता है, लेकिन किसी ऐसी कोशिश की बजाए इसे ठेके पर देने की जिद है।

सबसे बड़ा सवाल-किन हाथों में सौंप रहे हो

शहर की जनता और कई जनप्रतिनिधियों का भी सवाल यह है कि आखिर अरबों रुपए की यह बेशकीमती प्रापर्टी किन हाथों में सौंपने जा रहा है निगम। जिस कंपनी को नगर निगम टेंडर देने जा रहा है वह कंपनी राजेश मेहता और गुरजीत सिंह छाबड़ा यानी पिंटू छाबड़ा की है। इसका ऑफिस पिंटू छाबड़ा के सी-21 बिजनेस पार्क में हैं। ऑरेंज मेगास्ट्रक्चर एलएलपी के भागीदार राजेश मेहता और पिंटू छाबड़ा हैं, जबकि इसकी दूसरी कंपनी रिक्लूसिव रियल एस्टेट एंड एंटरटेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड के डारेक्टर पिंटू छाबड़ा और करण सिंह छाबड़ा हैं। ये लोग प्योर जमीन के जादूगर हैं और यहां भी वही करने वाले हैं। रीजनल पार्क से मोटी कमाई करेंगे ही साथ ही आसपास की जमीनों के भाव और बढ़ा देंगे।

आखिर निगम की क्या है मजबूरी

यहां सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर निगम की ऐसी क्या मजबूरी है कि अपने जमीनी कारनामों के लिए ख्यात कंपनी को इतनी बड़ी सार्वजनिक प्रॉपर्टी सौंपी जा रही है। महापौर परिषद में रखने के बाद संकल्प होना बाकी है। पूरी फाइल महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने अपने पास रख ली है। अब तक ईमानदारी और शहर हित की दुहाई देने वाले भार्गव को पता नहीं अचानक ऐसा क्या हुआ कि उन्हें सबकुछ ठीक दिखाई देने लगा है। जिन्हें महापौर ठेका देना चाहते हैं वे वही लोग हैं जो कई बार पहले भी कोशिश कर चुके हैं, लेकिन तब विरोध के बाद ठेका नहीं दिया गया था। पूर्व महापौर मालिनी गौड़ के समय भी ऐसी कोशिश हो चुकी है। अब ऐसा क्या हो गया कि फिर से उन्हें ही ठेका देने की जिद है।

इस खेल में एक पूरी टीम है सक्रिय

बताया जाता है कि ठेके के इस खेल में एक पूरी टीम सक्रिय हैं। सूत्र बताते हैं कि इसें एक मंत्री से लेकर प्रसिद्ध आर्किटेक्ट भी शामिल हैं। यह वही आर्किटेक्ट हैं जो नगर निगम के कई प्रोजेक्ट में कंसल्टेंट भी हैं। इसी टीम ने कई बार राजेश मेहता और पिंटू छाबड़ा को यह प्रोजेक्ट दिलाने की कोशिश की है। क्या नगर निगम के कर्णधारों को इतना भी समझ नहीं आ रहा कि आखिर यह कंपनी इतनी बड़ी प्रापर्टी क्यों अपने कब्जे में लेना चाहती है। और ताज्जुब तो तब होता है कि सामने गड्‌ढा दिखने के बाद भी आप उसी गड्‌ढे में गिरना चाहते हैं।

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