भारतीय मौसम विभाग ने इस वर्ष मानसून को लेकर चिंताजनक संकेत दिए हैं। अनुमान है कि इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से कमजोर रह सकता है, जिससे देशभर में औसत से कम बारिश होने की संभावना है।
मौसम विभाग के अनुसार, जून से सितंबर के बीच होने वाली वर्षा दीर्घकालिक औसत 87 सेंटीमीटर के लगभग 92 प्रतिशत तक सीमित रह सकती है। एलपीए के 90 से 95 प्रतिशत के बीच की बारिश को सामान्य से कम माना जाता है। निजी एजेंसी स्काईमेट ने भी करीब 94 प्रतिशत बारिश का अनुमान जताया है।
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आईएमडी के अनुसार, पूरे देश में वर्षा 92 प्रतिशत के आसपास रह सकती है, जिसमें 5 प्रतिशत तक कमी-पेशी संभव है। कुछ क्षेत्रों जैसे पूर्वोत्तर, उत्तर-पश्चिम और दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत में सामान्य से अधिक बारिश हो सकती है, लेकिन बाकी हिस्सों में कम वर्षा की आशंका है।
कमजोर मानसून का एक बड़ा कारण अल नीनो की संभावित स्थिति मानी जा रही है, जो आमतौर पर भारत में बारिश को कम कर देती है। हालांकि, सकारात्मक हिंद महासागर द्विध्रुव के बनने से मानसून के दूसरे हिस्से में कुछ राहत मिलने की उम्मीद भी जताई गई है।
भारत में कुल वर्षा का लगभग 75 प्रतिशत मानसून के दौरान होता है और देश की करीब आधी खेती इसी पर निर्भर है। ऐसे में कम बारिश का सीधा असर धान, दालों और तिलहन जैसी प्रमुख फसलों की बुवाई और उत्पादन पर पड़ सकता है।
यदि उत्पादन घटता है, तो खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे महंगाई का दबाव बढ़ेगा। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में आय घटने से बाजार की मांग कमजोर पड़ सकती है, जिसका असर देश की आर्थिक वृद्धि पर भी देखने को मिल सकता है।
इस प्रकार, कमजोर मानसून केवल मौसम का मुद्दा नहीं बल्कि कृषि, महंगाई और अर्थव्यवस्था से जुड़ी एक बड़ी चुनौती बनकर उभर सकता है।


