कैंसर इलाज में दवाइयों पर भारी खर्च की समस्या देश के आम मरीजों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। कांग्रेस ने केंद्र सरकार से इस मुद्दे पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए जानलेवा बीमारियों में दवाइयों की कीमतों और मुनाफाखोरी से जुड़े सवाल उठाए हैं।
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने केंद्र की नीतियों पर किया हमला
5 अक्टूबर 2026 को कांग्रेस महासचिव (संचार प्रभारी) जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को “जनविरोधी” बताते हुए कैंसर इलाज में दवाइयों की अत्यधिक कीमतों पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि मरीजों पर दवाइयों का भारी आर्थिक बोझ बढ़ रहा है, जो आम जनता के लिए असहनीय है।
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जयराम रमेश ने मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए बताया कि ₹74 का एक इंजेक्शन ₹4,980 में बेचा जा रहा है। उत्तर प्रदेश में मरीजों से लागत से 67 गुना अधिक शुल्क वसूला जा रहा है। यह स्थिति देश के स्वास्थ्य तंत्र की बड़ी समस्या को दर्शाती है।
कैंसर दवाओं का भारी आर्थिक बोझ आम जनता के लिए चिंता का विषय
कांग्रेस नेता ने खास तौर पर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी की दवाओं की कीमतों पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने बताया कि केवल एक दवा की 21 दिन की खुराक की कीमत लगभग ₹58,000 है। इस हिसाब से एक मरीज का सालाना खर्च लगभग ₹10 लाख तक पहुंच जाता है, जो आम लोगों की पहुंच से बाहर है।
इस भारी खर्च के कारण कई मरीज इलाज से वंचित हो रहे हैं या कर्ज लेकर इलाज करवाने को मजबूर हैं। दवाइयों की इस महंगाई ने मरीजों और उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति को गहराई से प्रभावित किया है।
केंद्र सरकार से पेटेंट कानून को लेकर सवाल उठाए गए
कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर पेटेंट अधिनियम की धारा 92 और 100 के प्रावधानों का सही उपयोग न करने का आरोप लगाया। ये धाराएं सार्वजनिक हित और सरकारी उपयोग के तहत जीवनरक्षक दवाओं के उत्पादन और वितरण को सुनिश्चित करती हैं।
इसके बावजूद मोदी सरकार ने इन धाराओं का उपयोग कर मरीजों को राहत क्यों नहीं दी, इस पर कांग्रेस ने कड़ी टिप्पणी की है। इस मुद्दे पर सरकार की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
केरल हाई कोर्ट के फैसले का कांग्रेस ने दिया हवाला
कांग्रेस ने केरल हाई कोर्ट के हालिया फैसले का उल्लेख करते हुए बताया कि अदालत ने स्पष्ट किया है कि सरकार पेटेंट एक्ट की धारा 100 के तहत पेटेंट वाली दवाओं का खुद या अधिकृत उत्पादन कराकर मरीजों को गैर-वाणिज्यिक आधार पर उपलब्ध करा सकती है।
फिर भी सरकार ने इस रास्ते को अपनाने में संकोच क्यों किया, यह सवाल कांग्रेस ने केंद्र से पूछा है। अदालत के इस फैसले का सही क्रियान्वयन मरीजों के लिए राहत साबित हो सकता था।
सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं की मुनाफाखोरी को ‘कत्लेआम’ बताया
29-30 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता ने दवाओं के अत्यधिक दामों पर कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने ₹2,700 की कैंसर दवा को ₹27,000 में बेचने को केवल मुनाफाखोरी नहीं बल्कि “नरसंहार/कत्लेआम” करार दिया।
यह टिप्पणी दवा उद्योग में मुनाफाखोरी की गंभीरता को दर्शाती है। कोर्ट ने निजी अस्पतालों की मनमानी पर भी सवाल उठाए, जहां मरीजों को महंगी दवाइयां खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है।
महंगी दवाइयों से मरीजों पर गहरा असर और आगे की संभावनाएं
महंगी दवाइयों के कारण कैंसर से पीड़ित मरीजों और उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति कमजोर हो रही है। इसके अलावा, यह स्थिति देश के स्वास्थ्य तंत्र की समग्र विश्वसनीयता पर भी प्रश्न चिह्न लगाती है।
आगे सरकार पर दबाव बढ़ सकता है कि वह पेटेंट कानून का सही उपयोग करते हुए दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करे और मरीजों को राहत प्रदान करे। वहीं, न्यायालय भी इस मामले में कड़ी निगरानी जारी रख सकता है।



