अब ब्लैकलिस्ट होने पर हाईकोर्ट जा सकते हैं ठेकेदार, इंदौर हाईकोर्ट की लार्जर बेंच ने दी बड़ी व्यवस्था, हालांकि हर मामले की नहीं होगी सुनवाई

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इंदौर। हाईकोर्ट इंदौर की 5 न्यायाधीशों वाली लार्जर बेंच ने ठेकेदारों को ब्लैकलिस्ट करने को लेकर एक बड़ी व्यवस्था दी है। बेंच ने 4:1 के बहुमत से स्पष्ट किया कि किसी ठेकेदार या कंपनी को ब्लैकलिस्ट करना केवल अनुबंध से जुड़ा विवाद नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक कार्रवाई है। इसलिए ऐसे आदेश को संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। हालांकि कि हर मामले की सुनवाई नहीं होगी।

उल्लेखनीय है कि इंदौर के एक ठेकेदार को करीब 60 लाख रुपए के निर्माण ठेके से जुड़े मामले में ब्लैकलिस्ट किए जाने के बाद यह विवाद हाईकोर्ट की लार्जर बेंच के सामने पहुंचा था। लंबी सुनवाई के बाद बेंच ने 262 पन्नों का फैसला सुनाया है।

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नगर निगम ने रद्द कर दिया था ठेका

बताया जाता है कि इंदौर नगर निगम द्वारा सांवेर विधानसभा क्षेत्र के वार्ड-21 स्थित अमरापुरी में सीसी रोड निर्माण के लिए करीब 60 लाख रुपए का ठेका नितिन इंटरप्राइजेस को दिया था। नवंबर 2020 में नगर निगम ने ठेका निरस्त कर दिया। नगर निगम का कहना था कि  सांवेर विधानसभा उपचुनाव के दौरान आदर्श आचार संहिता लागू होने के बावजूद ठेकेदार ने निर्माण कार्य कराया और अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन किया। इसलिए ठेका निरस्त किया जाता है।

तीन साल के लिए ठेकेदार कंपनी ब्लैकलिस्ट

नगर निगम ने ठेका निरस्त करने के बाद ठेकेदार कंपनी को तीन साल के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया। इतना ही नहीं कंपनी की करीब ढाई लाख रुपए की बैंक गारंटी भी जब्त कर ली। इसके बाद कंपनी ने इन कार्रवाइयों को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

दो पुराने फैसलों के कारण आ रही थी परेशानी

बताया जाता है कि ब्लैकलिस्टिंग से जुड़े मामलों में हाईकोर्ट के दो पुराने फैसलों में अलग-अलग कानूनी दृष्टिकोण सामने आए थे। वीवा हाईवेज मामले में कहा था कि ठेकेदार ब्लैकलिस्टिंग के खिलाफ सीधे हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सकता है। वहीं गौरी गणेश मामले में माना गया था कि ऐसे विवादों को मध्यप्रदेश मध्यस्थता अधिकरण अधिनियम, 1983 के तहत ट्रिब्यूनल के समक्ष ले जाया जाना चाहिए।

फैसलों में विरोधाभास को लेकर गठित हुई लार्जर बेंच

बताया जाता है कि दोनों फैसलों के बीच स्थिति स्पष्ट करने के लिए सितंबर 2024 में पांच न्यायाधीशों की लार्जर बेंच गठित की गई थी। लार्जर बेंच ने 4:1 के बहुमत से फैसला सुनाया। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया, न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर, न्यायमूर्ति विनय सराफ और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी बहुमत के पक्ष में रहे। वहीं न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल ने बहुमत की राय से असहमति जताई। बहुमत के फैसले के अनुसार ब्लैकलिस्टिंग के आदेश को संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।

ब्लैकलिस्टिंग के गंभीर परिणाम

हाईकोर्ट ने ब्लैकलिस्टिंग के गंभीर परिणामों को भी रेखांकित किया। किसी कंपनी या ठेकेदार के ब्लैकलिस्ट होने पर उसके लिए भविष्य में सरकारी ठेके हासिल करने के रास्ते बंद हो सकते हैं। इससे उसकी बाजार में साख और व्यावसायिक अवसर प्रभावित होते हैं। कोर्ट के अनुसार इसका नुकसान केवल आर्थिक आंकड़ों से नहीं आंका जा सकता। ब्लैकलिस्टिंग किसी कंपनी की प्रतिष्ठा को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है और कई मामलों में उसके कारोबार पर भी बड़ा असर डाल सकती है।

हर मामला हाईकोर्ट नहीं सुनेगा

हाईकोर्ट की लार्जर बेंच ने यह भी कहा है कि  ब्लैकलिस्टिंग से जुड़ा हर मामला स्वतः हाईकोर्ट में सुनवाई के लिए स्वीकार नहीं होगा। प्रत्येक याचिका के तथ्यों और परिस्थितियों को देखकर न्यायिक हस्तक्षेप का निर्णय लिया जाएगा। हाईकोर्ट विशेष रूप से ऐसे मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है, जहां ठेकेदार को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर नहीं दिया गया हो। कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत हुई हो। किसी नागरिक या कंपनी के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ हो। ब्लैकलिस्टिंग का आदेश ऐसे अधिकारी ने जारी किया हो, जिसके पास इसका अधिकार नहीं था। कार्रवाई मनमाने या अनुचित आधार पर की गई हो।

Harish Fatehchandani
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Harish Fatehchandani is a dedicated journalist with over a decade of experience in the media field. He is respected for his consistent and honest reporting.

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