इंदौर। कृष्णा गृह निर्माण संस्था को जमीन जमीन आवंटित करने के मामले में भारी गड़बड़ी की बात सामने आ रही है। लोकायुक्त को भेजी गई शिकायत में आईडीए के कई अफसरों को शक के घेरे में लिया गया है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि एक संस्था को पहले ही अनुबंधित जमीन का आवंटन किए जाने के बावजूद ईश्वर नगर की जमीन के बदले योजना क्रमांक 113 और 136 में अतिरिक्त भूखंड आवंटित करने की प्रक्रिया की गई।
करीब 40 करोड़ के राजस्व का हुआ नुकसान
कृष्णा गृह निर्माण सहकारी संस्था को अनुबंधित भूमि के अतिरिक्त करीब 4,047 वर्गमीटर भूमि के भूखंड आवंटित किए जाने को लेकर प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। मामले में प्राधिकरण के संकल्प क्रमांक-9 के प्रभारी, भू-अर्जन शाखा तथा संबंधित कर्मचारियों की भूमिका की जांच की मांग की गई है। शिकायतकर्ता ने दावा किया है कि इस पूरे प्रकरण में प्राधिकरण को करीब 40 करोड़ रुपये के संभावित आर्थिक नुकसान और संस्था को अनुचित लाभ पहुंचाने का प्रयास हुआ।
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पूर्व में समझौते के बाद भी दे दी जमीन
शिकायत में प्राधिकरण के पत्र क्रमांक 7559 दिनांक 10 सितंबर 2024 और पत्र क्रमांक 6872 दिनांक 24 अगस्त 2024 का हवाला देते हुए कहा गया है कि संस्था की कुल अनुबंधित भूमि 8.496 हेक्टेयर बताई गई थी। शिकायत के अनुसार, इसमें से ईश्वर नगर की 2 एकड़ यानी करीब 0.809 हेक्टेयर भूमि को लेकर पूर्व में संस्था के साथ समझौता हो चुका था। इसके बावजूद इसी भूमि के बदले योजना क्रमांक 113 में 17 तथा योजना क्रमांक 136 में 7 भूखंड, कुल 4,047 वर्गमीटर क्षेत्रफल के भूखंड आवंटित किए जाने का पत्र जारी किया गया।
बिना सक्षम स्तर की स्वीकृति के पत्र जारी
शिकायतकर्ता का मुख्य सवाल यह है कि संबंधित पत्र संकल्प-9 के प्रभारी द्वारा जारी किया गया, जबकि संकल्प-9 के प्रावधानों के अनुसार संस्था से संबंधित अनुबंध और आवंटन के मामलों में निर्णय एवं पत्राचार की जिम्मेदारी मुख्य कार्यपालिका अधिकारी की बताई गई है। शिकायत में आरोप है कि संकल्प प्रभारी का कार्य प्रस्ताव को प्रस्तुत करना और सक्षम अधिकारी के हस्ताक्षर से पत्र जारी करवाना था। बिना सक्षम स्तर की स्वीकृति के पत्र जारी कैसे हुआ?
2005 में हो चुका था भूमि का आवंटन?
दस्तावेजों के आधार पर शिकायतकर्ता ने यह भी सवाल उठाया है कि संस्था की अनुबंधित भूमि के संबंध में प्राधिकरण द्वारा वर्ष 2005 में ही आवंटन किया जा चुका था। शिकायत के अनुसार, संस्था की अनुबंधित भूमि 7.673 हेक्टेयर के आधार पर 36,450 वर्गमीटर क्षेत्रफल का प्रीमियम निर्धारित किया गया था। शिकायतकर्ता का दावा है कि प्राधिकरण ने 8.496 हेक्टेयर भूमि का भू-अर्जन कर उसका मुआवजा कलेक्टर कार्यालय में जमा कराया, जबकि संस्था से 7.673 हेक्टेयर भूमि के संबंध में ही मुआवजा लिया गया।
ईश्वर नगर की भूमि पर पहले हो चुका था समझौता
मामले में सबसे अहम दस्तावेजों में संस्था और प्राधिकरण के बीच हुए पूर्व समझौतों का उल्लेख किया गया है। शिकायत के मुताबिक, ईश्वर नगर की 2 एकड़ भूमि योजना क्रमांक 113 में शामिल रखे जाने और शेष भूमि को अनुबंध के अनुसार संस्था को विकसित कर देने पर सहमति बनी थी। शिकायत में यह भी कहा गया है कि संस्था ने न्यायालय में लंबित विविध याचिका क्रमांक 1172/89 वापस लेकर प्राधिकरण के पक्ष में समझौता किया था। समझौते में कथित तौर पर यह शर्त थी कि संस्था अथवा उसका कोई सदस्य भविष्य में ईश्वर नगर की 2 एकड़ भूमि के बदले भूखंड की मांग नहीं करेगा। इसी प्रकार 12 अक्टूबर 2000 के इकरारनामे का हवाला देते हुए शिकायतकर्ता ने कहा है कि ईश्वर नगर की भूमि के बदले भविष्य में भूखंड की मांग नहीं करने की शर्त संस्था के साथ तय की गई थी।
संस्था को अतिरिक्त भूमि देने का आधार क्या?
शिकायत में संकल्प क्रमांक 232 दिनांक 8 अक्टूबर 1993 और उसके यथा संशोधित संकल्प क्रमांक 83 दिनांक 15 फरवरी 2005 का भी उल्लेख किया गया है। शिकायतकर्ता के अनुसार, इन प्रावधानों के तहत पात्र संस्थाओं को विकसित आवासीय भूखंड उपलब्ध कराने की व्यवस्था थी, लेकिन इसका आधार वास्तव में योजना में उपलब्ध विकसित आवासीय भूखंडों का प्रतिशत था। ऐसे में सवाल यह उठाया गया है कि योजना क्रमांक 113 में संस्था को पहले से किए गए आवंटन के बाद अतिरिक्त भूखंड देने का आधार क्या था और इसके लिए कौन-सी सक्षम स्वीकृति प्राप्त की गई?
27 भूखंड खाली होने की जानकारी क्यों नहीं दी गई?
शिकायत में एक अन्य गंभीर सवाल यह भी उठाया गया है कि वर्ष 2005 के बाद योजना क्रमांक 113 में प्राधिकरण के करीब 27 भूखंड रिक्त बताए जा रहे थे। आरोप है कि संबंधित कर्मचारी को इसकी जानकारी होने के बावजूद यह जानकारी संपदा अधिकारी के समक्ष नहीं रखी गई। शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि ये भूखंड प्राधिकरण के पास उपलब्ध थे तो उन्हें नियमानुसार विक्रय कर प्राधिकरण को राजस्व प्राप्त हो सकता था। इसके बजाय संस्था को अतिरिक्त भूखंड देने की प्रक्रिया क्यों शुरू की गई, यह जांच का महत्वपूर्ण बिंदु है।
बोर्ड की बैठक और सक्षम स्वीकृति कहां है?
मामले में सबसे बड़ा प्रशासनिक सवाल यह है कि करोड़ों रुपये मूल्य की भूमि के कथित अतिरिक्त आवंटन के लिए क्या प्राधिकरण बोर्ड की बैठक में प्रस्ताव रखा गया था? यदि रखा गया था तो उसका प्रस्ताव, कार्यवाही और निर्णय क्या है? और यदि बोर्ड की स्वीकृति नहीं ली गई तो इतनी महत्वपूर्ण भूमि के आवंटन की प्रक्रिया किस अधिकार के तहत आगे बढ़ाई गई? शिकायत में यह भी सवाल उठाया गया है कि संबंधित पत्र पर मुख्य कार्यपालिका अधिकारी के हस्ताक्षर क्यों नहीं हैं और उसमें अध्यक्ष द्वारा अनुमोदित किए जाने का उल्लेख किस आधार पर किया गया। शिकायतकर्ता ने मामले में संकल्प-9 प्रभारी, भू-अर्जन अधिकारी, संबंधित लिपिक और नियोजन शाखा के अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका की जांच की मांग की है। आरोप लगाया गया है कि तत्कालीन अधिकारियों की कार्यवाही से वर्तमान मुख्य कार्यपालिका अधिकारी को पूरी जानकारी नहीं दी गई और उन्हें अधूरी जानकारी के आधार पर निर्णय की स्थिति में लाया गया।
शिकायत कराने वाले भी आईडीए के
लोकायुक्त को की गई शिकायत में सीईओ सहित कुछ अफसरों को बचाने की कोशिश भी की गई है। सूत्र बताते हैं कि शिकायत कराने वाले भी आईडीए में लंबे समय से संपदा शाखा और लीगल शाखा में जमे अधिकारी और कर्मचारी शामिल हैं। क्योंकि, इसमें कुछ अफसरो को बचाने की कोशिश भी की गई है।
अब संभागायुक्त पर टिकी हैं निगाहें
अब सबकी निगाहें संभागायुक्त और आईडीए अध्यक्ष भास्कर लक्षकार पर ही टिकी है। अगर वे मामले की जांच करते हैं तो कई अधिकारी लपेटे में आ जाएंगे। जांच में पता चलेगा कि ईश्वर नगर की 2 एकड़ भूमि के संबंध में हुए समझौते के बावजूद उसके बदले दोबारा भूखंड क्यों प्रस्तावित किए गए? संकल्प-9 के प्रभारी को ऐसा पत्र जारी करने का अधिकार था या नहीं? अतिरिक्त भूखंडों के आवंटन के लिए प्राधिकरण बोर्ड की स्वीकृति ली गई थी या नहीं? इसके साथ ही इस पूरे घटनाक्रम में सीईओ की कितनी भूमिका है।
सीईओ की भूमिका पर उठ रहे सवाल
इस पूरे प्रकरण में वर्तमान सीईओ डॉ.परीक्षित झाड़े की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं? क्या कोई अफसर या विभाग का बाबू बिना सीईओ के निर्देश के ऐसे आदेश निकाल सकता है? क्या सीईओ के संज्ञान के बिना इस तरह का कोई आवंटन हो सकता है? सूत्र बताते हैं कि सीईओ बार-बार ऊपर से निर्देश की बात कह रहे थे। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर वो निर्देश किसके थे? कहीं पूर्व संभागायुक्त व आईडीए अध्यक्ष ने तो निर्देश नहीं दिए? आखिर वह कौन मंत्री और अफसर थे, जिनके कारण जमीन का गलत आवंटन करने पर मजबूर होना पड़ा?



