कांग्रेस का पलटवार यूपीआई शुल्क पर विपक्ष के समर्थन का दावा गलत है। यह बयान कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मनीष तिवारी ने दिया, जो हाल ही में यूपीआई शुल्क को लेकर विपक्ष के बीच चल रही राजनीति पर केंद्रित है। यूपीआई शुल्क मुद्दे पर विपक्ष के समर्थन को लेकर चल रही बहस में कांग्रेस ने स्पष्ट किया है कि विपक्ष में ऐसा कोई एकमत नहीं है।
यूपीआई शुल्क पर विपक्ष के समर्थन के दावे को कांग्रेस ने खारिज किया
मनीष तिवारी ने कहा कि यूपीआई शुल्क पर विपक्ष के समर्थन का दावा पूरी तरह गलत और झूठा है। उन्होंने यह भी बताया कि कांग्रेस सांसदों ने इस मुद्दे पर किसी भी तरह का समर्थन नहीं किया है। यह बयान तब आया जब भाजपा और कुछ अन्य दलों ने आरोप लगाया कि कांग्रेस सांसदों ने यूपीआई पर 0.4 प्रतिशत चार्ज को लेकर समर्थन दिया था।
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कांग्रेस के इस पलटवार ने विपक्ष में इस मुद्दे को लेकर चल रही असहमति को स्पष्ट किया है। विपक्ष के अन्य दल भी इस विवाद से दूरी बनाए हुए हैं।
संसदीय समिति की बैठक में यूपीआई शुल्क पर कोई चर्चा नहीं हुई
गौरव गोगोई ने वित्त मामलों की स्थायी समिति की बैठक का हवाला देते हुए कहा कि इस समिति में यूपीआई शुल्क या MDR चार्ज पर कोई चर्चा नहीं हुई। इस तथ्य ने कांग्रेस के दावे को और मजबूत किया है कि सांसदों ने इस मामलो पर कोई समर्थन नहीं दिया।
यह भी बताया गया कि समिति की बैठक में इस विषय पर न तो प्रस्ताव रखा गया और न ही उस पर मतदान हुआ। इससे यह स्पष्ट होता है कि यूपीआई शुल्क को लेकर विपक्ष के बीच कोई एकमत नहीं था।
यूपीआई शुल्क क्या है और इसका आम आदमी पर असर
यूपीआई शुल्क दरअसल डिजिटल भुगतान के लिए लगने वाला एक प्रोसेसिंग चार्ज है। सरकार ने हाल ही में 0.4 प्रतिशत का यह शुल्क तय किया है, जिसे मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) के नाम से भी जाना जाता है। इससे व्यापारियों को भुगतान स्वीकार करने पर थोड़ा अतिरिक्त शुल्क देना पड़ता है।
हालांकि, सरकार का कहना है कि यह शुल्क सीधे ग्राहकों पर नहीं डालेगा। लेकिन विपक्ष और कई विशेषज्ञों का मानना है कि अंततः यह बोझ आम आदमी तक पहुंच सकता है, खासकर छोटे व्यापारियों के माध्यम से।
भाजपा का जवाब और कांग्रेस का भ्रम फैलाने का आरोप
भाजपा ने यूपीआई शुल्क को लेकर कांग्रेस पर भ्रम फैलाने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि यह शुल्क ग्राहकों पर असर नहीं डालेगा और यह केवल मर्चेंट पर लागू होगा। भाजपा नेताओं ने कांग्रेस की आलोचना करते हुए कहा कि विपक्ष जानबूझकर इस मुद्दे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है।
इस जवाब से राजनीतिक बहस और तेज हो गई है, जिसमें दोनों पक्ष अपने-अपने दावे मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
यूपीआई शुल्क विवाद का राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव
यह विवाद न केवल राजनीतिक क्षेत्र में गरमाई है, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी इसका असर महत्वपूर्ण है। डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए यूपीआई एक अहम माध्यम है। इसलिए शुल्क लगाए जाने से व्यापारियों और उपभोक्ताओं के बीच असंतोष फैल सकता है।
राजनीतिक पार्टियां इस मुद्दे का इस्तेमाल चुनावी लाभ के लिए कर सकती हैं। वहीं, आम जनता की सहूलियत को देखते हुए इस विवाद का समाधान जरूरी नजर आता है।
आगे यूपीआई शुल्क को लेकर क्या हो सकता है
इसके बाद सरकार और विपक्ष के बीच बातचीत या संसदीय चर्चा की संभावना बनी हुई है। कई विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि इस शुल्क को लेकर व्यापक जनमत संग्रह या व्यापारिक समुदाय की राय ली जानी चाहिए।
इसके अलावा, डिजिटल भुगतान को प्रोत्साहित करने वाले कदमों के साथ इस शुल्क को लेकर संतुलन बनाए रखना सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण होगा। आम आदमी और व्यापार दोनों को ध्यान में रखकर ही भविष्य में कोई निर्णय लिया जाएगा।



