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इंदौर। इंदौरी भूमाफियाओं का एक और नया कारनामा उजागर हुआ है। यहां बिना बिके ही सौ करीब की जमीन बिक गई और उसकी रजिस्ट्री भी हो गई, लेकिन जमीन मालिक को पता ही नहीं। शिकायत मिलने के बाद कलेक्टर द्वारा कराई गई जांच में यह मामला उजागर हुआ है। खास बात यह कि इन जमीनों की रजिस्ट्री के रिकॉर्ड भी रजिस्ट्रार ऑफिस में मौजूद हैं, लेकिन मूल रजिस्ट्री गायब है। अब कलेक्टर ने इस मामले में एफआईआर के निर्देश दिए हैं।
इस मामले में कलेक्टर आशीष सिंह के पास लंबे समय से शिकायतें पहुंच रही थीं। कई लोगों ने कहा कि उनकी संपत्तियों की अन्य लोगों द्वारा फर्जी रजिस्ट्रियां करा ली गई हैं, जबकि उन्होंने अपनी संपत्ति बेची ही नहीं। कलेक्टर आशीष सिंह ने इसकी जांच वरिष्ठ जिला पंजीयक दीपक शर्मा से कराई। शिकायत सही पाए जाने पर दो मामलों में थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई थी।
रिकॉर्ड रूम प्रभारी को किया सस्पेंड
शिकायत की जांच के बाद कलेक्टर के आदेश पर रिकॉर्ड रूम प्रभारी को सस्पेंड किया गया था। इसके साथ नगर निगम के कर्मचारियों पर भी कार्रवाई के लिए लिखा गया था। जब दो मामले इस तरह के सामने आए तो कलेक्टर ने इस पर गंभीरता दिखाते हुए ऐसे मामलों की जांच के लिए एक पांच सदस्यी कमेटी बना दी।
कमेटी की जांच में 20 और मामले मिले
कलेक्टर के निर्देश पर जिला पंजीयक चक्रपाणि मिश्रा के निर्देशन में 5 सदस्यीय जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट तैयार की। यह रिपोर्ट कलेक्टर के पास पहुची। पता चला कि ऐसी 20 फर्जी रजिस्ट्रियां कराई गई है। जिन जमीनों की फर्जी रजिस्ट्रियां कराई गई हैं, उनका बाजार मूल्य 100 करोड़ रुपए से ज्यादा है।
पंजीयन कार्यालय से ओरिजनल रजिस्ट्री गायब
जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि जिला पंजीयन कार्यालय के रिकॉर्ड रूम में रखे जाने वाले रिकॉर्ड में भी मूल रजिस्ट्रियां हटाकर फर्जी रजिस्ट्रियां लगा दी गई हैं। यह बिना रिकॉर्ड रूम के कर्मचारियों के मिलीभगत के संभव ही नहीं है। निश्चित तौर पर रजिस्ट्रार कार्यालय के कई कर्मचारी इसमें शामिल हैं। इस मामले में जिला पंजीयन कार्यालय द्वारा पंढरीनाथ थाने में एफआईआर दर्ज कराई जाएगी।
फर्जी रजिस्ट्रियों के दम पर कब्जे की कोशिश
विडंबना यह है कि अपनी मेहनत की कमाई से जमीन-मकान खरीदकर बैठे लोगों को पता ही नहीं कि उनकी संपत्ति बिक गई है। भूमाफियाओं ने सिर्फ फर्जी रजिस्ट्री ही नहीं कराई बल्कि इन्ही रजिस्ट्रियों के माध्यम से संपत्तियों पर कब्जे की कोशिश भी की।
इतना बड़ा फर्जीवाड़ा आखिर हुआ कैसे?
सबसे बड़ा सवाल है कि इतना बड़ा फर्जीवाड़ा आखिर हुआ कैसे। क्या संबंधित विभागों के कर्मचारियों पर अधिकारियों की नजर नहीं होती। ऐसे काम तो कोई एक दिन में हुए नहीं होंगे। अभी तो शिकायत हुई, कलेक्टर की जांच में पकड़ में भी आ गई, लेकिन क्या गारंटी है कि आगे ऐसे मामले नहीं होंगे?



