महाकाल मंदिर की पूरी व्यवस्था बिगाड़ रहे पूर्व एडिशनल एसपी जयंत राठौर, हत्या के आरोपी रहे आशीष दुबे के भस्मारती प्रभारी होने पर भी उठ रहे सवाल

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इंदौर। उज्जैन में पदस्थ सारे वरिष्ठ अधिकारी यह व्यवस्था बनाने में लगे रहते हैं कि महाकाल के दर्शन करने जाने वाले श्रद्धालुओं को कोई परेशानी न हो, लेकिन मंदिर समिति के कुछ कर्मचारियों के कारण उन्हें निराशा हाथ लगती है। महाशिवरात्रि में कोई व्यवस्था न बिगड़े इसके लिए संभागायुक्त आशीष सिंह, कलेक्टर रोशन कुमार सिंह, एसपी प्रदीप शर्मा, निगमायुक्त अभिलाष मिश्रा, मंदिर प्रशासक प्रथम कौशिक कल रात भर जगे रहे, लेकिन इनकी मेहनत पर मंदिर के सुरक्षा व्यवस्था प्रभारी जयंत राठौर ने पानी फेर दिया।

उल्लेखनीय है कि जयंत राठौर उज्जैन में एडिशनल एसपी रह चुके हैं। रिटायर होने के बाद जुगाड़ कर वे मंदिर के सुरक्षा प्रभारी बन गए। जब वे एडिशनल एसपी थे, तब भी वे महाकाल मंदिर की व्यवस्थाएं बिगाड़ते रहे हैं। कई बार वे उन्होंने अपने साथी अधिकारियों के साथ नियम तोड़कर गर्भगृह में पूजा की है। वे पहले भी अपने परिचितों को गर्भगृह में दर्शन कराते थे, अब रिटायर होने के बाद भी यही कर रहे हैं। सारे गार्ड और हर प्वाइंट पर तैनात सुरक्षाकर्मी जाहिर है उनके इशारे पर ही काम करते हैं। इसलिए चाहे भस्मारती हो या सामान्य दर्शन आम लोगों को हमेशा परेशान ही होना पड़ता है।

वरिष्ठ अधिकारियों की भी नहीं सुनते राठौर

राठौर के तेवर ऐसे हैं कि वे वरिष्ठ अधिकारियों की भी नहीं सुनते। आमतौर पर भस्मारती से लेकर दिन भर के दर्शन के लिए वरिष्ठ अधिकारियों की तरफ से प्रोटोकॉल में प्वाइंट भेजे जाते हैं, लेकिन राठौर साहब उसकी परवाह नहीं करते। वे पहले अपने परिचितों को ही दर्शन कराते हैं। चाहे आप कोई भी हों, आपको किसी भी अधिकारी ने भेजा है, जयंत राठौर अपने लोगों के अलावा किसी की नहीं सुनते। कल रात भस्मारती के समय सारे वरिष्ठ अधिकारियों के परिश्रम पर तब पानी फिर गया जब राठौर अपने ही लोगों को अंदर प्रवेश कराते रहे। राठौर साहब कल रात भी लोगों से उलझते रहे। एक वीआईपी परिवार से उनकी जमकर बहस हो गई। वह परिवार किसी वरिष्ठ अधिकारी के माध्यम से आया था, लेकिन राठौर ने उनकी एक न सुनी। राठौर की हरकतों से आम लोग ही नहीं, मंदिर के पुजारी से लेकर कर्मचारी तक परेशान हैं। इनके तेवर ऐसे कि अभी अपनी निजी गाड़ी पर पुलिस की बत्ती लगाकर घूमते हैं।

हत्या के आरोपी को बना रखा है भस्मारती प्रभारी

एक नवंबर 2015 की रात को उज्जैन के रामघाट मार्ग योगमाया मंदिर के पास लाला त्रिपाठी और नन्नू गुरु गुट के बीच सड़क पर ही गैंगवार हुई थी। इसमें पूर्व पार्षद विश्वास त्रिपाठी उर्फ लाला सहित दोनों गुट के तीन लोग मारे गए थे। इस मामले में पुलिस ने आशीष दुबे, रोहित पंड्या, राजेश शर्मा, शिवेश व्यास और नीलेश त्रिवेदी के खिलाफ हत्या का प्रकरण दर्ज किया था। बाद में आरोपी बरी हो गए। इसी हत्याकांड के आरोपी आशीष दुबे वर्षों से भस्मारती प्रभारी बने हुए हैं। यहां सवाल यह उठता है कि आखिर मंदिर समिति के पास क्या ऐसी मजबूरी है कि एक हत्याकांड के आरोपी को भस्मारती जैसे महत्वपूर्ण काम का प्रभार सौंप रखा है। इसकी इतनी जमावट है कि प्वाइंट वालों से भी बदतमीजी करता है।

दादागिरी इतनी की वर्षों से एक ही जगह टिके हैं

मंदिर समिति के नियमों के तहत हर महीने वहां तैनात कर्मचारियों के ड्यूटी बदलने का प्रावधान है, लेकिन आशीष दुबे वर्षों से भस्मारती प्रभारी बने हुए हैं। यही हाल जितेंद्र पवार का भी है। वह भी वर्षों से गर्भगृह निरीक्षक के पद पर हैं। इसके कारण इन्होंने अपनी अलग ही व्यवस्था बना रखी है। अगर कोई वरिष्ठ अधिकारी भी चाहे तो वह किसी को दर्शन नहीं करा सकता, क्योंकि जयंत राठौर, आशीष दुबे और जितेंद्र पवार जैसे लोगों की अनुमति के बगैर मंदिर परिसर में पत्ता भी नहीं हिलता।

मंत्री विजयवर्गीय ने पूरे परिवार सहित की पूजा

मंदिर समिति के नियमों के तहत गर्भगृह में मुख्यमंत्री, हाईकोर्ट जज तथा महामंडलेश्वर के ही पूजा करने की छूट है। इसके बाद भी हर बार की तरह मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने पूरे परिवार सहित गर्भगृह में जाकर पूजा की। इतना ही नहीं भस्मारती के दौरान भी पास बनवाकर आए लोगों के आगे पुजारी परिवार की महिलाएं भी बैठी नजर आईं और वे इस तरह से बैठी थीं कि पीछे के लोगों को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। जब तक बड़े अधिकारी वहां मौजूद थे, तब तक सब ठीक था, लेकिन उनके जाते ही जयंत राठौर और आशीष दुबे ने पूरी व्यवस्था बिगाड़ दी। वह भी ऐसा तब हुआ जब प्रशासन ने पास भी कम जारी किए थे और पूरी रात व्यवस्था बनाने में जुटे रहे।

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