इंदौर कोई आज का शहर नहीं है। यह मध्यप्रदेश को सबसे ज्यादा राजस्व देना वाला शहर है, लेकिन विडंबना यह कि इसे कुछ नहीं मिलता। इसे कोई मुंबई का बच्चा कह देता है, तो कोई कुछ और। कई बार इंदौर के साथ चोट हो चुकी है और यह सिलसिला जारी है।
अब इंदौर एक बार फिर दुखी हुआ है। इंदौर के लोगों का दुख यह है कि इसे कहने को मेट्रो शहर कहा जाता है, लेकिन जब मेट्रोपॉलिटन अथॉरिटी बनती है तो हेडक्वार्टर उज्जैन हो जाता है। इतना ही नहीं उज्जैन का नाम आगे भी आ जाता है।
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सरकार की तरफ से जो नोटिफिकेशन जारी हुआ है, उसमें नाम उज्जैन-इंदौर मेट्रोपॉलिटन रीजन (यूआईएमआर) रखा गया है। मेट्रोपॉलिटन एरिया में भी इंदौर की आबादी ज्यादा है, फिर भी हेडक्वार्टर उज्जैन बन गया।
शहर में धीरे-धीरे आवाज उठने लगी है। सोशल मीडिया पर भी लोग अपना दर्द बयां कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि इसमें कोई दो राय नहीं कि महाकाल की नगरी उज्जैन इंदौर से कदमताल करे। वह भी खूब आगे बढ़े, लेकिन इससे शहर का हक नहीं मारा जाना चाहिए।
इस मामले में जनप्रतिनिधियों की चुप्पी भी खतरनाक है। सबकुछ पक रहा था। इस शहर से दो-दो कैबिनेट मंत्री हैं। भाजपा के 9-9 विधाक हैं, महापौर हैं लेकिन किसी की आवाज जनता को सुनाई नहीं दी। सांसद शंकर लालवानी कह रहे हैं कि उन्होंने मुख्यमंत्री को पत्र लिखा था। इसमें मेट्रोपॉलिटन रीजन का मुख्यालय इंदौर में स्थापित करने की मांग की थी, लेकिन यह पत्र भी किसी ने नहीं देखा। जब हंगामा बरपा तो सांसद ने बताया कि पत्र लिखा है।
लोग सवाल पूछ रहे हैं कि जब भोपाल में बैठे सारे अधिकारी और नेता अपने बच्चों को इंदौर में पढ़ा रहे हैं, अपने आलीशान बंगले और फार्म हाउस इंदौर में बना रहे हैं, अपने परिवार को इंदौर में रख रहे हैं, तो फिर जब इंदौर को कुछ देने की बारी आती है तो पीछे क्यों हट जाते हैं?
शहर के लोग यह भी कह रहे हैं कि इंदौर बिना सहारे के भी अपने पैरों पर खड़ा रहा है और होता रहेगा। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरे देश में स्वच्छ भारत मिशन का आह्वान किया, तो इसी इंदौर ने देश में आठ बार नंबर वन आकर मध्यप्रदेश का नाम रौशन किया।
लोग यह भी कह रहे हैं कि उज्जैन की तासिर अलग है और इंदौर की अलग। उज्जैन एक तीर्थ नगरी है, उसे इंदौर नहीं बनाया जा सकता। ठीक इसी तरह इंदौर को भी उज्जैन नहीं बनाया जा सकता।
लोग सवाल पूछ रहे हैं कि ऐसे में इंदौर के साथ इस तरह की नाइंसाफी क्यों?
इतना जरूर है कि यह फैसला कुछ सोच-समझ कर ही लिया गया होगा, लेकिन इंदौर की जनता के मन के सवालों का जवाब जरूरी है।
और यह सवाल है-आखिर इंदौर कब तक बच्चा रहेगा?
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