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भारत सरकार विकास के दावे करती जा रही है। संसद में वंदेमातरम पर चर्चा हो रही है, लेकिन रुपए की चिन्ता कोई नहीं कर रहा। रुपया लगातार गिरता जा रहा है। सोमवार को यह अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 90.05 पर बंद हुआ था और आज मंगलवार को 10 पैसे टूटकर 90.15 प्रति डॉलर हो गया। अगर यही हाल रहा तो यह भारत की अर्थव्यवस्था को डुबो देगा।
पिछले कई महीनों में रुपए को थोड़ी राहत तब मिली थी, जब भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा छह महीने में पहली बार रेपो रेट में कटौती की गई थी। उस दिन रुपया डॉलर के मुकाबले 89.95 पर बंद हुआ था। इसके बाद फिर रुपया लगातार गिरता रहा।
डॉलर की मजबूती और रुपये की कमजोरी का मुख्य कारण बाजार में डॉलर की कमी और मांग में वृद्धि बताई जा रही है। ट्रंप के टैरिफ से भारत का निर्यात घटा है और विदेशी निवेश भी कम हुआ है। इसके साथ ही तेल और सोने जैसी आयात के लिए डॉलर की जरूरत बढ़ी है।
रुपया गिरने से भारत के कई सेक्टरों पर इसका असर दिखने लगा है। पेट्रोल‑डीजल और रसोई के तेल से लेकर मोबाइल, टीवी, मशीनरी जैसे सामानों और बहुत कुछ का आयात करता है। रुपया कमजोर होते ही इन्हें खरीदने के लिए ज्यादा रुपए देने पड़ते हैं, इसलिए पेट्रोल‑डीजल, गैस, हवाई टिकट, इलेक्ट्रॉनिक्स, इंपोर्टेड दवाएं और गाड़ियां महंगी होने लगती हैं। जब ईंधन महंगा होता है, तो इसका असर हर सेक्टर पर पड़ता है।
इसके अलावा इसका असर पढ़ाई, इलाज या घूमने के लिए विदेश जाने वालों पर साफ दिखने लगा है। ट्यूशन फीस, हॉस्टल, टिकट सब डॉलर में तय होते हैं, इसलिए रुपया गिरने पर भारतीय परिवारों को लाखों रुपए अधिक देने पड़ रहे हैं। विदेश से ऑनलाइन शॉपिंग, एप सब्सक्रिप्शन, जैसी सेवाएं भी धीरे‑धीरे महंगी होने लगी हैं।
सबसे चिन्ता की बात यह है कि लगातार गिरते रुपए पर सरकार की गंभीरता नहीं दिखाई दे रही। सरकार वंदे मातरम को सम्मान दिलाने और एसआईआर पर पूरी ताकत लगा रही है, लेकिन रुपए की बात संसद में नहीं उठती।
अभी भी समय है जाग जाओ सरकार। रुपए के डूबने की गति को थामो, वर्ना वह दिन दूर नहीं जब रुपया पूरी तरह डूब जाएगा और साथ में देश की अर्थव्यवस्था को भी ले डूबेगा।



