देश में वायु प्रदूषण को लेकर आई नई स्टडी ने गंभीर चिंता बढ़ा दी है। अध्ययन के मुताबिक पिछले एक दशक में पार्टिकुलेट मैटर (PM) प्रदूषण में करीब 20 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है, जिसमें बिहार और पश्चिम बंगाल सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यों के रूप में सामने आए हैं।
बोस इंस्टिट्यूट द्वारा की गई यह स्टडी प्रतिष्ठित जर्नल एटमोस्फेरिक एनवायरनमेंट में प्रकाशित हुई है। शोध में खुलासा हुआ है कि मैदानों में फैल रहा प्रदूषण अब हिमालयी क्षेत्रों तक पहुंच चुका है, जिससे पहाड़ों की स्वच्छ हवा भी प्रभावित हो रही है।
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अध्ययन के अनुसार थर्मल पावर प्लांट, बायोमास जलाना और शहरी ठोस कचरे को जलाने से लगातार बढ़ रहे उत्सर्जन ने हालात को गंभीर बना दिया है। यह रिसर्च गंगा के मैदानों, हिमालयी क्षेत्रों और पूर्वोत्तर भारत के 25 वर्षों के सैटेलाइट डेटा पर आधारित है।
स्टडी में बताया गया कि मैदानों से निकलने वाले प्रदूषक सीधे हिमालय में एरोसोल की मात्रा बढ़ा रहे हैं। एरोसोल वातावरण में मौजूद धूल, कालिख और रासायनिक बूंदों जैसे सूक्ष्म कणों को कहा जाता है, जो जलवायु और स्वास्थ्य दोनों के लिए बेहद खतरनाक माने जाते हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब , हरियाणा और दिल्ली का प्रदूषण हिमालय की पश्चिमी और मध्य श्रेणियों तक पहुंच रहा है, जबकि बिहार और पश्चिम बंगाल से निकलने वाला प्रदूषण पूर्वी हिमालय को प्रभावित कर रहा है।
हालांकि अध्ययन में यह भी पाया गया कि नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम के चलते बिहार, पश्चिम बंगाल और असम में पार्टिकुलेट मैटर के स्तर में कुछ सुधार देखने को मिला है। इसके बावजूद ये क्षेत्र अब भी कार्बनयुक्त एरोसोल के बड़े हॉटस्पॉट बने हुए हैं।
स्टडी के आंकड़ों के अनुसार, 2000–2009 के दौरान जो कार्बन प्रदूषण बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तरी पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा और बांग्लादेश के कुछ हिस्सों तक सीमित था, वह 2020–2024 तक पूरे पश्चिम बंगाल, बिहार, बांग्लादेश और पूर्वोत्तर राज्यों के बड़े हिस्सों में फैल चुका है।



