फिल्म ‘अस्सी’ मार्मिक, प्रासंगिक लेकिन….

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-डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार
फिल्म अस्सी मार्मिक है, प्रासंगिक भी है, कड़े सवाल उठाती है, बेचैन कर देती है, लेकिन कई सीन और प्रसंग तार्किक नहीं है।
देश में हर साल करीब 30 हजार बलात्कार होते हैं, यानी रोजाना करीब 80, हर बीस मिनट में एक। इसीलिए फिल्म में हर बीस मिनट बाद परदे पर 20 मिनट्स लिखा आता है जो इशारा है कि आपको फिल्म देखते हुए 20 मिनट हो गए यानी देश में कहीं न कहीं बलात्कार की रिपोर्ट हुई होगी।
यह फिल्म सामूहिक बलात्कार का दंश झेल रही महिला की कहानी है और भारतीय समाज, शिक्षा व्यवस्था, पुरुषवादी पितृसत्तात्मक सोच, न्याय व्यवस्था, भ्रष्टाचार आदि की तरफ इशारा करती है, समाज असंवेदनशील हो गया है यह भी बताती है, लेकिन सब कुछ समेट लेने के प्रयास में यह भटकने लगती है।
फिल्म में कोर्टरूम है, लेकिन वहां जघन्य बलात्कार जैसी वारदात पर तर्कों और झूठे सबूतों से पर्दा डालने की कोशिश होती है, कोर्ट में कच्चे-पक्के तर्क रखे जाते हैं, लेकिन अपराधियों और पीड़िता की मोबाइल लोकेशन की जाँच नहीं होती। अगर एक ही गाड़ी में छह लोग जा रहे हैं, तो दिल्ली शहर में उनकी गतिविधियों की पड़ताल क्या मुश्किल थी? वकील साहिबा जासूस बनने की कोशिश कराती हैं और बीच में एक तथाकथित क्रांतिकारी ‘अंब्रेलामैन’ कूद पड़ता है, जिसकी सोशल मीडिया में चर्चा हो रही है।
बलात्कारियों में से एक का बाप अपनी थैली लेकर कूद पड़ा है और शो मैनेज कर रहा है। नसीरूद्दीन शाह का पात्र भी कूदने लगता है और फिजूल खर्च हो जाता है। फिल्म के कई प्रसंग और पात्र बेतुके तथा बेजान हैं। कई प्रसंग तीखे सवाल खड़े करते हैं और कई वास्तविक नहीं लगते।

हाई प्रोफ़ाइल क्राइम में मीडिया की भूमिका भी सवाल खड़े करती है। लेकिन फिल्म में कई छोटे-छोटे प्रसंग दिल दहला देते हैं। स्कूल में जिस छात्र को छह साल से शिक्षिका पढ़ा रही थी, वही छात्र उस शिक्षिका के साथ सामूहिक बलात्कार होने पर व्हाट्सएप ग्रुप में लिखता है—‘मुझे इनवाइट क्यों नहीं किया गया?’
बलात्कार पीड़िता परिमा (कानी कुसरुति) का किरदार इतना सशक्त और इतना टूटा हुआ है कि चुप्पी चीखती है, उसकी सांसें लड़खड़ाती हैं, तापसी पन्नू वकील बनकर आई हैं और कानून की किताब को हथियार बनाती है। वो डायलॉग नहीं बोलती, वो सिस्टम पर वार करती है। एक सीन में जब वो कोर्ट में खड़ी होकर कहती है कुछ ऐसा कि पूरी हॉल सन्नाटे में डूब जाता है। किसी वकील का डायलॉग, कोई जज की टिप्पणी, पुलिस वाले की बेतुकी दलील पर दर्शकों को हंसी आती है और अगले ही पल आप सोचते हैं कि – अरे ये तो सच में होता है !
मनोज पाहवा, कुमुद मिश्रा, जीशान अय्यूब, नसीरुद्दीन शाह, रेवती भी हैं और पीड़िता के बेटे के रोल में इंदौर का बाल कलाकार अद्विक जायसवाल फिल्म और कहानी के केंद्र में है, जिसकी आंखें जुबान से ज्यादा बोलती हैं।
फिल्म की शुरुआत में एक मार्मिक दृश्य है, जब एक पात्र विनय अपने बेटे को स्कूल बस में दीदी को पहले चढ़ने देने की सीख देता है। इसका संदेश साफ है कि सही परवरिश से ही संवेदनशील समाज बन सकता है।
यह फिल्म मनोरंजन के लिए नहीं बनी, मज़े के लिए जो फिल्म देखते हैं, उनके लिए टालनीय !

Ardhendu Bhushan - Consulting Editor
Ardhendu Bhushan - Consulting Editorhttp://www.hbtvnews.com
Ardhendhu Bhushan is a senior consulting editor with extensive experience in the media industry. He is recognized for his sharp editorial insight and strategic guidance.

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