– डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार
देशभक्ति दिल से निकली भावना है लेकिन फिल्म वालों के लिए देशभक्ति एक मसाला है, वे समझते हैं कि इसे फिल्म में डाल दो तो फिल्म हिट हो जाएगी। देशभक्ति दिल से निकलती है, और कॉमेडी दिमाग से… पर जब डायरेक्टर इन दोनों को मिक्सी में डालकर पीस देते हैं, तो बनती है फिल्म – ‘उड़ता तीर’! देशभक्ति और जबरन कॉमेडी को कभी आपस में मिलाना नहीं चाहिए।
तिरंगे का जज्बा और बॉर्डर का गंभीर माहौल वह जगह नहीं है, जहाँ हर थोड़ी देर में सस्ते पंचलाइन, स्लैपस्टिक जोक्स और उछल-कूद वाले तमाशे घुसा दिए जाएँ। हँसी बुरी चीज नहीं, व्यंग्य भी जरूरी है, लेकिन जब फिल्मकार हर गंभीर स्थिति को चुटकुले में बदलने लगें तो देशभक्ति का जज्बा भी मनोरंजन के शोर में दब जाता है। फिल्म की मुश्किल यहीं से शुरू होती है। वह तय ही नहीं कर पाती कि उसे गंभीर जासूसी थ्रिलर बनना है, देशभक्ति का नारा लगाना है, राजनीतिक व्यंग्य करना है या दर्शकों को गुदगुदाने वाली कॉमेडी। नतीजा यह कि कई जगह कहानी अपने ही बनाए जाल में फँसती दिखाई देती है। तीर उड़ता जरूर है, लेकिन हर बार निशाने पर लगे, यह जरूरी नहीं।
👉 यह भी पढ़ें:
‘उड़ता तीर’ देखते वक्त सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि जब आपको देश के लिए गर्व महसूस होना चाहिए, तब स्क्रीन पर कोई फनी बनने की नाकाम कोशिश कर रहा होता है। नतीजा? न तो आप खुलकर हँस पाते हैं, और न ही देशभक्ति का फील आ पाता है। फिल्म में भारत और पाकिस्तान को एक ही तराजू में बराबर दिखने की कोशिश की गई है. कहाँ भारत और कहाँ पाकिस्तान !
उड़ता तीर में पाकिस्तानी जासूस का भारतीय देशभक्त बन जाना अपने आप में हास्यास्पद कल्पना है। मगर जब हर किरदार को कार्टून बना दिया जाए और हर गंभीर परिस्थिति को तमाशे में बदल दिया जाए, तो कहानी की धार भोथरी हो जाती है। देशभक्ति कोई ऐसा मसाला नहीं कि हर दृश्य में एक चुटकी डाल दी जाए। तिरंगा दिखाकर, आतंकवादी का नाम लेकर या सीमा का जिक्र करके फिल्म अपने आप देशभक्तिपूर्ण नहीं हो जाती। देशभक्ति का भाव कहानी, चरित्रों के फैसलों और उनके जोखिम से पैदा होता है।

जासूसी फिल्म में दर्शक को यह भरोसा होना चाहिए कि घटनाएँ चाहे कितनी भी अप्रत्याशित हों, उनके पीछे कोई तर्क है। कॉमेडी में दर्शक को किरदारों की मूर्खताओं पर हँसना चाहिए, न कि पटकथा की सुविधा पर। ऑपरेशन सिंदूर जैसी वास्तविक घटना का उल्लेख भी काल्पनिक कहानी में आता है। उसे कथानक में स्वाभाविक जगह होनी चाहिए। केवल मौजूदा घटनाओं का नाम ले लेने से फिल्म की गंभीरता नहीं बढ़ जाती।
आयुष्मान खुराना को भी अच्छी पटकथा चाहिए। जब दृश्य केवल अगले मजाक तक पहुँचने का साधन बन जाएँ, तो अभिनय की बारीकियाँ पीछे छूट जाती हैं। सारा अली खान के रोमांस के लिए जगह निकालने की कोशिश फिल्म को और भटकाती है। राहुल बोस, राम कपूर, गुलशन ग्रोवर, सुहैल नैयर, बृजेंद्र काला और मुकुल देव आदि भी परदे पर आते जाते हैं। निर्देशक ने इस ‘कॉमिक-पैट्रियोटिज्म’ के चक्कर में खुद ही उड़ता तीर ले लिया है। देशभक्ति जज्बात है, मज़ाक नहीं!
यह आयुष्मान खुराना की सबसे खराब फिल्म है।
टालनीय और अपाच्य !

– डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार



