भारतीय राजनीति में एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। जिस पार्टी का नाम कुछ समय पहले तक शायद ही किसी ने सुना था और जिसे एक विधानसभा चुनाव में महज 822 वोट मिले थे, वही पार्टी आज अचानक राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गई है।
यह कहानी है नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) की, जिसमें तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों ने विलय की घोषणा कर दी है। इस कदम के बाद राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलते दिखाई दे रहे हैं और बंगाल की राजनीति में नए संघर्ष के संकेत मिल रहे हैं।
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कैसे चर्चा में आई NCPI?
चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार, NCPI को 20 जनवरी 2023 को एक “रजिस्टर्ड अनरिकॉग्नाइज्ड पॉलिटिकल पार्टी” (RUPP) के रूप में पंजीकरण मिला था। पार्टी का पंजीकरण पश्चिम बंगाल में हुआ, लेकिन उसने अपना पहला चुनावी प्रयोग त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में किया।
दिलचस्प बात यह है कि त्रिपुरा चुनाव में पार्टी को कोई बड़ी सफलता नहीं मिली। पार्टी ने सात सीटों पर उम्मीदवार उतारने की कोशिश की थी, लेकिन कई नामांकन रद्द हो गए और अंततः वह सीमित सीटों पर ही चुनाव लड़ सकी।
चुनाव परिणामों में पार्टी को चावमानू सीट पर 536 और कैलाशहर सीट पर 286 वोट मिले। यानी कुल मिलाकर केवल 822 वोट। इसके बावजूद आज वही पार्टी 20 लोकसभा सांसदों के समर्थन के साथ राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गई है।
कौन चला रहा है NCPI?
पार्टी के अध्यक्ष उत्तिया कुंडू हैं, जबकि कोषाध्यक्ष शेउली कुंडू हैं। चुनाव आयोग के दस्तावेजों के अनुसार, पार्टी को अपने शुरुआती दौर में बहुत सीमित आर्थिक संसाधन प्राप्त हुए थे। रिपोर्टों के मुताबिक पार्टी को कुल लगभग 1.13 लाख रुपये का चंदा मिला था।
पार्टी के नेताओं का कहना है कि शुरुआत में उनका उद्देश्य त्रिपुरा के आदिवासी और वंचित समुदायों की आवाज को राजनीतिक मंच देना था। हालांकि संसाधनों की कमी और आंतरिक मतभेदों के कारण संगठनात्मक गतिविधियां लगभग ठप पड़ गई थीं।
TMC में सबसे बड़ा राजनीतिक झटका?
रविवार को हुए घटनाक्रम ने अचानक NCPI को राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण खिलाड़ी बना दिया। TMC के 20 बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर NCPI में विलय की जानकारी दी और संसद में अलग बैठने की व्यवस्था की मांग भी की।
इस बागी गुट में वरिष्ठ सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय जैसे बड़े नाम भी शामिल बताए जा रहे हैं। राजनीतिक सूत्रों का मानना है कि यह घटनाक्रम पश्चिम बंगाल की राजनीति में आने वाले दिनों में बड़े बदलावों का संकेत हो सकता है।
दल-बदल कानून से बचने की रणनीति?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अलग गुट बनाने के बजाय किसी मौजूदा पार्टी में विलय का रास्ता चुनना बागी सांसदों के लिए रणनीतिक कदम हो सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि सीधे अलग समूह बनाने पर दल-बदल कानून से जुड़े सवाल खड़े हो सकते हैं।
सूत्रों के अनुसार, आने वाले महीनों में यह गुट TMC के संगठनात्मक ढांचे और राजनीतिक नेतृत्व को लेकर भी बड़े दावे पेश कर सकता है। इससे बंगाल की राजनीति और अधिक रोचक हो सकती है।
822 वोट से 20 सांसदों तक का सफर
कुछ महीने पहले तक जो पार्टी राजनीतिक गुमनामी में थी, वह अब संसद की राजनीति में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही है। यह भारतीय लोकतंत्र की उन दुर्लभ घटनाओं में से एक मानी जा रही है, जहां एक छोटे संगठन ने अचानक राष्ट्रीय सुर्खियां बटोर ली हैं।
अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि NCPI इस नए राजनीतिक अवसर को किस तरह संभालती है और क्या वह आने वाले चुनावों में अपनी मौजूदगी को मजबूत कर पाती है या नहीं।
आपकी राय क्या है?
क्या TMC के 20 सांसदों का NCPI में विलय पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकता है? या यह केवल एक अस्थायी राजनीतिक रणनीति है?
कमेंट करके अपनी राय जरूर बताएं। क्या 822 वोट पाने वाली पार्टी वास्तव में राष्ट्रीय राजनीति में नई ताकत बन सकती है?



